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________________ गा० २०३] चारित्रमोहक्षपक कृष्टिवेदकक्रिया-निरूपण ८४५ १०१०. तदो जवमझं कायव्यं । १०११. जम्हि चेव समयपबद्धणिल्लेवणट्ठाणाणं जवमझ, तम्हि चेव भवबद्धणिल्लेवणहाणाणं जवमझ । १०१२. अदीदे काले जे समयपबद्धा एक्केण पदेसग्गेण णिल्लेविदा ते थोवा । १०१३. वेहिं पदेसेहिं विसेसाहिया । १०१४. एवमणतरोवणिधाए अणंताणि हाणाणि विसेसाहियाणि । १०१५. ठाणाणं पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागपडिभागे जबमझ । १०१६. गाणंतरं थोवं । १०१७. एगंतरमणंतगुणं । १०१८. अंतराणि अंतरद्वदाए कि समयप्रबद्धके जघन्य निर्लेपनस्थानसे ऊपर नियमतः अन्तर्मुहूर्तमान स्थितियोके जानेपर भवबद्धका जघन्य निर्लेपनस्थान होता है, ऐसा निश्चय करना चाहिए । चूर्णिसू०-तदनन्तर यवमध्यप्ररूपणा करना चाहिए । जिस ही समयमे समयप्रबद्धके निर्लेपनस्थानोंका यवमध्य प्राप्त होता है, उस ही समयमे भववद्धके निर्लेपनस्थानोका यवमध्य प्राप्त होता है ।।१०१०-१०११॥ विशेषार्थ-इस यवमध्यप्ररूपणाको इस प्रकार जानना चाहिए- जघन्य निर्लेपनस्थानसे लगाकर उत्कृष्ट निर्लेपनस्थान तक निर्लेपित हुए समयप्रबद्ध और भवबद्धोकी अतीत काल-विषयक शलाकाओंको ग्रहण करके यह यवमध्यप्ररूपणा की गई है। उसका स्पष्टीकरण यह है कि जघन्य निर्लेपनस्थान पर पूर्वमे निर्लेपित हुए समयप्रबद्ध और भवबद्ध सबसे कम हैं । समयोत्तर निर्लेपनस्थानपर विशेष अधिक हैं। द्विसमयोत्तर निर्लेपनस्थानपर विशेष अधिक हैं । इस प्रकार निरन्तर समय-समय प्रति विशेष अधिकके क्रमसे बढ़ते हुए पल्योपमके असंख्यातवें भाग आगे जानेपर दुगुनी वृद्धि हो जाती है। इन दुगुण वृद्धिरूप भी स्थानोंके पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमित आगे जाकर निर्लेपनस्थानोके असंख्यातवें भागके प्राप्त होनेपर यवमध्य प्राप्त होता है। तत्पश्चात् विशेष हीन क्रमसे उत्कृष्ट निर्लेपनस्थानके प्राप्त होने तक इसी प्रकारकी प्ररूपणा करना चाहिए । यहाँ इतना विशेप जानना चाहिए कि सर्व निर्लेपनस्थानोंपर पूर्वमे निर्लेपित हुए समयप्रबद्ध और भववद्धोका प्रमाण अनन्त है; क्योंकि अतीतकालकी अपेक्षा उनका अनन्त होना स्वाभाविक ही है । __चूर्णिसू०-अतीतकालमें जो समयप्रबद्ध एक-एक प्रदेशाग्ररूपसे निर्लेपित हुए हैं, वे सबसे कम हैं। जो समयप्रबद्ध दो-दो प्रदेशाग्ररूपसे निर्लेपित हुए हैं, वे विशेष अधिक हैं। इस प्रकार अनन्तरोपनिधारूप श्रेणीकी अपेक्षा अनन्त स्थान विशेष-विशेष अधिक होते हैं। इन समयप्रबद्धशेषस्थानोके पल्योपमके असंख्यातवे भागके प्रतिभागमे यवमध्यस्थान प्राप्त होता है। यवमध्यसे अधस्तन और उपरिम नानान्तर अर्थात् समस्त नानागुणहानिशलाकाएँ अल्प है। एकान्तर अर्थात् एकगुणहानिस्थानकी शलाकाएँ अनन्तगुणित हैं । क्योकि अन्तरके लिए अर्थात् एक-एक गुणहानिस्थानका अन्तर निकालने के लिए अवस्थापित अन्तर अर्थात् नानागुणहानिशलाकाओका प्रमाण पल्योपमके अर्धच्छेदोके भी असंख्यातवें
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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