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________________ गा० २०३ ] चारित्रमोहक्षपक-कृटिवेदकक्रिया निरूपण ९६९. अदीदे काले एगजीवस्स जहण्णए णिल्लेवणड्डाणे पिल्लेविदव्वाणं समयबद्धाणमेसो कालो थोवो । ९७०. समयुत्तरे विसेसाहिओ । ९७१. पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागमेत्ते दुगुणो । ९७२. ठाणाणमसंखेज्जदिभागे जवमज्यं । ९७३. णाणादु गुणहाणिट्ठाणंतराणि पलिदोवमच्छेदणाणमसंखेज्जदिभागो । ९७४ णाणागुणहाणिट्ठाणंतराणि थोवाणि । ९७५. एयगुणहाणिहाणंतरमसंखेजगुणं । ९७६. एक म्हि ट्ठिदिविसेसे एकस्स वा समयबद्धस्स सेसयं दोन्हं वा तिन्ह वा, उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागमेत्ताणं समयपबद्धाणं । ९७७ एवं चेव दूसरा अप्रवाह्यमान उपदेश । प्रवाद्यमान उपदेश के अनुसार निर्लेपनस्थानोंका प्रमाण पल्योपमके असंख्यातवें भाग है । किन्तु अप्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार निर्लेपनस्थानोकी संख्या कर्मस्थितिके असंख्यात बहुभागप्रमाण है । अब प्रवाद्यमान उपदेशका अवलम्बन करके प्रत्येक जीवने अतीतकालमे जघन्य निर्लेपनस्थान से लेकर उत्कृष्ट निर्लेपनस्थान तक एक-एक स्थान पर जो अनन्तानन्त वार किये हैं, उनमे प्रत्येक स्थानका अतीतकालसम्बन्धी समुदित निर्लेपनकाल यद्यपि अनन्तसमयप्रमाण है, तथापि उनमे परस्पर जो हीनाधिकता है, उसके बतलानेके लिए निर्लेपन किये गए समयप्रबद्धोके समुच्चयकालका अल्पबहुत्व कहते हैं चूर्णिस० - अतीतकालमे एक जीवके जघन्य निर्लेपनस्थानपर अवस्थित होकर निर्लेपित पूर्व अर्थात् पहले निर्लेपन किये गये समयप्रबद्धोका जो समुदित काल है, वह अनन्तप्रमाण होकरके भी वक्ष्यमाण कालोकी अपेक्षा सबसे कम है । समयोत्तर अर्थात् अनन्तरसमयवर्ती दूसरे निर्लेपनस्थानपर निर्लेपितपूर्व समयप्रवद्धोका समुदित काल विशेष अधिक है । ( तीसरे निर्लेपनस्थानपर विशेष अधिक है । इस प्रकार विशेष अधिकके क्रमसे बढ़ता हुआ वह समुदित काल ) पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमित निर्लेपनस्थानोके व्यतीत होनेपर दुगुना हो जाता है । उक्त क्रमसे निर्लेपनस्थानोके असंख्यातवे भागपर कालसम्बन्धी यवमध्य प्राप्त होता है ।। ९६९ ९७२ ॥ अब इस यवमध्यसे अधस्तन और उपरितन नानागुणहानिशलाका आदिका प्रमाण कहते हैं ८३९ चूर्णिसू०[० - नाना दुगुण- हानिस्थानान्तर पल्योपमके अर्धच्छेदोके असंख्यातवे भाग । नाना गुणहानिस्थानान्तर अल्प हैं । एक गुणहानिस्थानान्तर असंख्यातगुणित ॥९७३-९७५॥ अब अभव्यसिद्धो की अपेक्षा उपर्युक्त चार भाष्यगाथा ओमेसे प्रथम भाष्यगाथाकी विभाषा करते हैं चूर्णि सू० [0- एक स्थितिविशेषमें एक समयप्रबद्धका शेप होता है, दो समय प्रवद्धोके भी शेप होते हैं, तीन समयप्रवद्धोके भी शेष होते हैं, इस प्रकार बढ़ते हुए उत्कर्पसे पल्यो - पमके असंख्यातवे भाग- प्रमित समयप्रवद्धोके शेष होते है । इस ही प्रकार भववद्धोके भी
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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