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________________ कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार ९६२. एसा सव्वा चदुहिं गाहाहि खवगस्स परूवणा कदा । ९६३. एदाओ चेव चत्तारि चि गाहाओ अभवसिद्धियपाओग्गे णेदवाओ। ९६४. तत्थ पुत्वं गमणिज्जा पिल्लेवणहाणाणसुवदेसपरूवणा । ९६४. एत्थ दुविहो उवएसो । ९६६. एक्केण उवदेसेण कम्महिदीए असंखेज्जा भागा णिल्लेवणहाणाणि । ९६७. एक्केण उवएसेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो । ९६८. जो पवाइज्जइ उवएसो तेण उवदेसेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो, असंखेन्जाणि वग्गमूलाणि णिल्लेवणहाणाणि । चूर्णिस०-इन उपर्युक्त चार भाष्यगाथाओके द्वारा यह सव कृष्टिवेदक क्षपककी प्ररूपणा की गई। अब ये चारो ही भाष्यगाथाएँ अभव्यसिद्धिक जीवकी योग्यतारूपसे भी विभाषा या व्याख्या करनेके योग्य हैं ।।९६२-९६३।। विशेषार्थ-अभव्य जीवोके कर्म-वन्धके योग्य परिणामोंको अभव्यसिद्धिक-प्रायोग्य परिणाम कहते है । अर्थात् जिस स्थानपर भव्य जीव और अभव्य जीवोके स्थिति-अनुभागवन्धादिके परिणाम सदशरूपसे प्रवृत्त होते है, या एकसे रहते हैं, उन्हे अभव्यसिद्धिकप्रायोग्य जानना चाहिए । ऊपर जिस प्रकारसे चार भाष्यगाथाओके द्वारा कृष्टिवेदक क्षपकके भवबद्धशेप और समयप्रवद्धशेषकी प्ररूपणा की गई है, उसी प्रकारसे अभव्यसिद्धिकोके कर्मों के बँधने योग्य स्थलपर भी भववद्धशेप और समयप्रवद्धशेष की प्ररूपणा करना चाहिए। वह किस प्रकार करना चाहिए, यह चूर्णिकार आगे स्वयं कहेगे। चूर्णिसू०-इस विषयमे सर्वप्रथम निर्लेपनस्थानोके उपदेशकी प्ररूपणा जाननेके योग्य है । इस विषयमे दो प्रकारके उपदेश पाये जाते है । एक उपदेशके अनुसार तो निर्लेपनस्थान कर्मस्थितिके असंख्यात बहुभागप्रमाण होते है। एक उपदेशसे पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण होते हैं। अर्थात् जो उपदेश प्रवाहरूपसे चल रहा है, उस उपदेशके अनुसार निर्लेपनस्थान पल्योपमके असंख्यातवे भाग हैं, जिनका कि प्रमाण पल्योपमके असंख्यात वर्गमूलप्रमाण है ॥९६४-९६८॥ विशेषार्थ-कर्म-लेपके दूर होनेके स्थानको निर्लेपनस्थान कहते हैं । अर्थात् एक समयमें वॅधे हुए कर्म-परमाणु वन्धावलीके पश्चात् क्रमशः उदयमें प्रविष्ट होकर और सान्तर या निरन्तररूपसे अपना फल देते हुए जिस समयमें सभी निःशेपरूपसे निर्माण होते हैं, उसे निर्लेपनस्थान कहते हैं । विभिन्न समयोमे बंधे हुए कर्म विभिन्न समयोमें ही निःशेषरूपसे निर्लेपको प्राप्त होते है, अतः उनकी संख्या बहुत होती है। उन निर्लेपनस्थानोंकी संख्या कितनी होती है, इस विषयमे दो प्रकारके उपदेश पाये जाते हैं-एक प्रवाह्यमान उपदेश और १ को अभवसिद्धियपाओग्गविसयो णाम ? भवसिद्धियाणमभवसिद्धियाण च जत्थ ठिदि-अणुभागबधादिपरिणामा सरिसा होदूण पयति, सो अभवसिद्धियपाओग्गविसयो ति भण्णदे । जयध २ तत्थ किं णिल्लेवणट्ठाण णाम ? एगसमये बद्धकम्मपरमाणवो बधावलियमेत्तकाले वोलिदे पच्छा उदय पविसमाणा केत्तिय पि कालं सातरणिरतरसरूवेणुदयमागतूण जम्हि समयम्हि सत्वे चेव णिस्सेसमुदय कादण गच्छंति तेसि णिरुद्धभवसमयपबद्धपदेसाणं तण्णिल्लेवणटठाणमिदि भण्णदे ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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