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________________ ८४० कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार अववद्धसेसाणि । ९७८. पडमाए गाहाए अत्थो समत्तो भवदि । ९७९. जवमझ कायव्वं, विस्सरिदं लिहिदु। शेप जानना चाहिए। इस प्रकार प्रथम भाप्यगाथाका अर्थ समाप्त हो जाता है । यहॉपर यवमध्यकी प्ररूपणा करना चाहिए । ( पहले क्षपकप्रायोग्यप्ररूपणाके अवसरमें ) हम लिखना भूल गये ॥९७६-९७९॥ विशेपार्थ-अभव्यसिद्धोंके योग्य की जानेवाली इस प्ररूपणामें प्रथम भाष्यगाथाकी विभापा करते हुए यवमध्यकी प्ररूपणा करना आवश्यक है। क्षपक-प्रायोग्यप्ररूपणामे भी इस यवमध्यप्ररूपणाका किया जाना आवश्यक था, पर चूर्णिकार कहते हैं, कि वहॉपर हम लिखना भूल गये, इसलिए यहॉपर उसकी सूचना कर रहे हैं। वह इस प्रकार जानना चाहिए-अतीतकालकी अपेक्षा एक जीवके एक स्थितिविशेषमे एक-एक रूपसे रहकर उदयको प्राप्त होकर निर्लेपित हुए जो समयप्रवद्ध-शेप है, ये अनन्त होकर भी वक्ष्यमाण समयप्रवद्धोकी अपेक्षा सबसे कम है। पुनः दो दोके रूपमें रहकर उदयको प्राप्त होकर निर्लेपित हुए जो समयप्रबद्ध-शेप है, वे विशेप अधिक है। तीन-तीनके रूपमे रहकर उदयको प्राप्त होकर निर्लेपित हुए जो समयप्रबद्ध-शेष हैं, वे विशेप अधिक हैं। इस प्रकार चार, पॉच आदिके क्रमसे बढ़कर पल्योपमका असंख्यातवॉ भाग प्राप्त होने तक एक स्थितिविशेषमें रहकर और उदयको प्राप्त होकर निर्लेपित हुए समयप्रबद्ध-शेष दुगुने होते हैं। पुनः पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमित विशेष अधिक स्थान जानेपर उदयको प्राप्त होकर निर्लेपित होनेवाले समयप्रबद्धशेष दुगुने प्राप्त होते हैं। इस प्रकार पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमित दुगुण वृद्धियोंके व्यतीत होनेपर समयप्रबद्ध-शेपोकी वृद्धिका यवमध्य प्राप्त होता है । उस यवमध्यसे ऊपर सर्वत्र विशेपहीनके क्रमसे स्थान प्राप्त होते हैं। समयप्रवद्ध-शेपोके ये विशेषहीन स्थान तब तक प्राप्त होते हुए चले जाते हैं, जब तक कि पल्योपमका उत्कृष्ट असंख्यातवॉ भाग न प्राप्त हो जाय । समयप्रवद्ध-शेपोकी यवमध्यप्ररूपणाके समान भववद्ध-शेपोकी भी यवमध्यप्ररूपणा करना चाहिए। कितने ही आचार्य इस यवमध्यप्ररूपणाका नाना स्थितिविशेषोको आश्रय लेकरके व्याख्यान करते है। उनका कहना है कि एक स्थितिविशेपमे शेषरूपसे रहकर अपवर्तनाके द्वारा उदयको प्राप्त होकर निर्लेपनभावको प्राप्त होनेवाले समयप्रबद्ध थोड़े है। दो स्थितिविशेषोमे शेषरूपसे रहकर अपवर्तनाके वशसे उदयको प्राप्त होकर निर्लेपित होनेवाले समयप्रवद्ध विशेष अधिक है। इस प्रकार विशेष अधिकके क्रमसे तीन, चार आदिको लेकर पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमित स्थितिविशेषोमें शेषरूपसे रहकर अपवर्तनाके वशसे उदयको प्राप्त कर निर्लेपनपर्यायको प्राप्त होनेवाले समयप्रबद्धोकी शलाकाएँ दुगुनी होती हैं । इस प्रकार दुगुणवृद्धिरूप पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमित स्थान जानेपर यवमध्य प्राप्त होता है। पुनः विशेष हानिका क्रम अन्तिम विकल्प प्राप्त होने तक चलता है। पर जयधवलाकार इस व्याख्यानको असमीचीन ठहराते है । उनका कहना है कि प्रथम भाष्यगाथा एकस्थितिविशेष-विषयक है, उस समय नानास्थिति-विषयक समयप्रबद्धशेषोकी प्ररूपणा
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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