SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 941
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गा० २०० ] चारित्रमोहक्षपक कृष्टिवेदकक्रिया-निरूपण ९२३. एत्थ चत्तारि भासगाहाओ । ९२४. तासि समुचित्तणा । (१४७) एकम्मि द्विदिविसेसे भवसेसगसमयपबद्धसेसाणि । णियमा अणुभागेसु य भवंति सेसा अणंतेसु ॥२००॥ ९२५. विहासा । ९२६. समयपवद्धसेसयं णाम किं १ ९२७. जं समयपबद्धस्स वेदिदसेसग्गं पदेसग्गं दिस्सइ, तम्मि अपरिसेसिदस्मि एगसमएण उदयमागदम्मि तस्स समयपवद्धस्स अण्णो कम्मपदेसो वा णत्थि तं समयपवद्धसेसगं णाम । ९२८. एवं चेव भवबद्धसेसयं । ९२९, एदीए सण्णापरूवणाए पठमाए भासगाहाए विहासा । ९३०. तं जहा । ९३१. एकम्हि हिदिविसेसे कदिहं समयपबद्धाणं सेसाणि होज्जासु ? ९३२. एक्कस्स वा समयपबद्धस्स दोण्हं वा तिहं वा, एवं गंतूण उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागमेत्ताणं समयपबद्धाणं । चूर्णिसू०-इस मूलगाथाके अर्थकी विभाषा करनेवाली चार भाष्यगाथाएँ हैं। उनकी समुत्कीर्तना इस प्रकार हैं ॥९२३-९२४॥ एक स्थितिविशेषमें नियमसे एक-अनेक भवबद्धोंके समयबद्ध-शेष और एकअनेक समयोंमें बँधे हुए कर्मोके समयप्रबद्ध-शेष असंख्यात होते हैं । और वे समयप्रवद्ध-शेष नियमसे अनन्त अनुभागोंमें वर्तमान होते हैं ॥२०॥ चूर्णिसू० अब उक्त भाष्यगाथाकी विभाषा की जाती है ॥९२५॥ शंका-समयप्रबद्ध-शेष नाम किसका है ? ॥९२६॥ समाधान-समयप्रबद्धका वेदन करनेसे अवशिष्ट जो प्रदेशाग्र दिखाई देता है उसके अपरिशेषित अर्थात् सामस्त्यरूपसे एक समयमे उदय आनेपर उस समयप्रबद्धका फिर कोई अन्य कर्मप्रदेश अवशिष्ट नहीं रहता है, उसे समयप्रबद्ध-शेष कहते है ॥९२७॥ चूर्णिसू०-इसी प्रकारसे भवबद्ध शेष भी जानना चाहिए ॥९२८॥ विशेषार्थ-समयप्रबद्ध-शेषमे तो एक समयप्रबद्धके कर्मपरमाणुओको ही ग्रहण किया जाता है । किन्तु भवबद्ध-शेषमे कमसे कम अन्तर्मुहूर्तमात्र एक भव-बद्ध समयप्रबद्धोके कर्मपरमाणु ग्रहण किये जाते हैं । यह समयप्रबद्ध-शेष और भवबद्ध-शेपमे अन्तर जानना चाहिए । चूर्णिसू०-इस संज्ञाप्ररूपणाके द्वारा प्रथम भाष्यगाथाकी विभाषा की जाती है। वह इस प्रकार है ॥९२९-९३०॥ शंका-एक स्थितिविशेषमे कितने समयप्रबद्धोके शेष बचे हुए कर्म-परमाणु होते हैं ? ॥९३१॥ समाधान-एक स्थितिविशेपमे एक समयप्रबद्धके शेप कर्मपरमाणु रहते हैं, दो समयप्रबद्धोके भी शेष रहते हैं, तीन समयप्रबद्धोके भी शेष रहते हैं, इस प्रकार एक-एक समयप्रबद्धके बढ़ते हुए क्रमसे अधिकसे अधिक पल्योपमके असंख्यातवे भागमात्र समयप्रबद्धोके कर्म-परमाणु शेष रहते हैं ॥९३२॥ १०५
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy