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________________ ८३४ कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार ९३३. भववद्धसेसयाणि वि एक्कम्मि द्विदिविसेसे एक्कस्स वा भववद्धस्स दोण्हं वा तिण्हं वा एवं गंतूण उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेजदिमागमेत्ताणं भववद्धाणं । ९३४. णियमा अणतेसु अणुभागेसु भवबद्धसेसगं वा समयपवद्धसेसगं वा । ९३५. एत्तो विदियाए भासगाहाए समुक्त्तिणा । ९३६. तं जहा । (१४८) डिदि-उत्तरसेढीए भवसेस-समयपवद्धसेसाणि । एगुत्तरसेगादी उत्तरसेढी असंखेज्जा ॥२०१॥ ९३७ चिहासा । ९३८. तं जहा । ९३९. समयपवद्धसेसयमेक्कम्मि हिदिविसेसे दोसु वा तीसु वा एगादिएगुत्तरमुक्कस्सेण विदियहिदीए सव्वासु हिदीसु पढयहिदीए च समयाहियउदयावलियं मोत्तृण सेसासु सव्यासु ठिदीसु णाणासमयपवद्धसेसाणं णाणेगभवनद्धसेसयाणं च । ९४० एत्तो तदियाए भासगाहाए समुक्कित्तणा। (१४९) एक्कम्मि द्विदिविसेसे सेसाणि ण जत्थ होति सामण्णा । आवलिगासंखेज्जदिमागो तहिं तारिसो समयो ॥२०२॥ चूर्णिसू०--इसी प्रकार भवबद्ध-शेष भी जानना चाहिए । अर्थात् एक स्थितिविशेपमे एक भववद्धके, दो भववद्धके, तीन भववद्धके इस प्रकार बढ़ते हुए उत्कर्षसे पल्योपमके असंख्यातवे भागमात्र भवबद्धोंके शेष कर्मपरमाणु पाये जाते है। वह पबद्ध-शेष या समयप्रबद्ध-शेष कर्म-परमाणु नियमसे अनन्त अविभागप्रतिच्छेदरूप अनुभागोमें वर्तमान रहता है ।।९३३.९३४॥ चूर्णिसू०-अव इससे आगे दूसरी भाष्यगाथाकी समुत्कीर्तना की जाती है। वह इस प्रकार है ॥९३५-९३६॥ __ एकको आदि लेकर एक-एक बढ़ाते हुए जो स्थितियोंकी वृद्धि होती है, उसे स्थिति-उत्तरश्रेणी कहते हैं। इस प्रकारकी स्थिति-उत्तरश्रेणीमे भववद्ध-शेष और समयप्रवद्ध-शेप असंख्यात होते हैं ॥२०१॥ चूर्णिसू०-अब उक्त भाष्यगाथाकी विभापा की जाती है। वह इस प्रकार हैसमयप्रवद्धशेष एक स्थितिविशेपमे पाया जाता है, दो स्थितिविशेषोमे भी पाया जाता है, तीन स्थितिविशेपोंमे भी पाया जाता है। इस प्रकार एकको आदि लेकर एकोत्तर वृद्धिके क्रमसे उत्कर्षसे द्वितीयस्थितिकी सर्व स्थितियोमे पाया जाता है और प्रथमस्थितिकी समयाधिक उदयावलीको छोड़कर शेष सर्व स्थितियोमे पाया जाता है। इसी प्रकार नाना समयप्रवद्ध-शेषोकी तथा नाना और एक भवबद्ध-शेषोकी प्ररूपणा करना चाहिए ।।९३७-९३९॥ चूर्णिसू०-अव इससे आगे तीसरी भाष्यगाथाकी समुत्कीर्तना की जाती है ॥९४०॥ जिस किसी एक स्थितिविशेषमें समयप्रबद्ध-शेप और भववद्ध-शेप सम्भव हैं, वह सामान्यस्थिति और जिसमें वे सम्भव नहीं वह असामान्यस्थिति कहलाती है । उस क्षपकके वर्पपृथक्त्वमात्र स्थितिविशेपमें तादृश अर्थात् भववद्ध और समयप्रबद्ध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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