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________________ ८२१ ८२१ गा० १८३] चारित्रमोहक्षपक कृष्टिवेदक-निरूपण ८५२. एदिस्से तिणि भासगाहाओ । ८५३. तं जहा। (१३०) दोसु गदीसु अभजाणि दोसु भजाणि पुव्वबद्धाणि । एइंदिय कायेसु च पंचसु भजा ण च तसेसु ॥१८३॥ ८५४. विहासा । ८५५. एदस्स खवगस्स दुगदिसमज्जिदं कम्मं णियमा अस्थि । तं जहा-तिरिक्खगदिसमज्जिदं च मणुसगदिसमज्जिदं च । ८५६. देवगदिसमज्जिदं च णिरयगदिसमज्जिदं च भजियव्वं । ८५७. पुड चिकाइय-आउकाइय-तेउकाइयवाउकाइय-वणप्फदिकाइएसु एत्तो एकेकेण काएण समज्जिदं भजियव्वं । ८५८. तसकाइयं समज्जिदं णियमा अस्थि । अन्वेषण किया गया है। प्रस्तुत गाथामें गति, इन्द्रिय, काय और कषायमार्गणामे उत्कृष्ट अनुत्कृष्ट स्थिति-अनुभाग-संयुक्त संचित पूर्वबद्ध कर्मोंके संभव-असंभवताका निर्णय करनेके लिए प्रश्न उपस्थित किये गये हैं, जिनका कि उत्तर आगे कही जानेवाली तीन भाष्यगाथाओके द्वारा दिया जायगा। गाथा-पठित 'गति' पदसे गतिमार्गणा ग्रहण की गई है। 'भव' पदसे इन्द्रिय और कायमार्गणा सूचित की गई है, क्योकि भव एकेन्द्रियादि जाति और स्थावरादिकायरूप ही होता है । 'कषाय' पदसे कषायमार्गणाका ग्रहण किया गया है। इस प्रकार समग्र गाथाका यह अर्थ निकलता है कि गति आदि मार्गणाओमें संचित पूर्वबद्ध कर्म किन-किन कृष्टियोंमे और उनकी किन-किन स्थितियोमे संभव है और किन-किनमे नहीं ? इसका स्पष्टीकरण आगे कही जानेवाली भाष्यगाथाओमें किया गया है । चूर्णिसू०-उपयुक्त मूलगाथाके अर्थका व्याख्यान करनेवाली तीन भाष्यगाथाएँ हैं । वे इस प्रकार हैं ।।८५२-८५३॥ पूर्वबद्ध कर्म दो गतियोंमें अभजनीय है और दो गतियोंमें भजनीय हैं। तथा एक एकेन्द्रियजाति और पाँच स्थावरकायोंमें भजनीय हैं, शेष चार जातियोंमें और त्रसकायमें भजनीय नहीं हैं ॥१८३॥ चर्णिसू०-अब इस भाष्यगाथाकी विभाषा की जाती है-इस कृष्टिवेदक क्षपकके दो गतियोमे समुपार्जित कर्म नियमसे होता है । वह इस प्रकार है-तिर्यग्गतिसमुपार्जित कर्म भी है और मनुष्यगति समुपार्जित कर्म भी है। देवगतिसमुपार्जित और नरकगतिसमुपानित कर्म भजितव्य है। पृथिवीकायिक, अप्कायिक, तैजस्कायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक इन पाँचोमेंसे एक-एक कायके साथ समुपार्जित कर्म भजितव्य है। बसकायिक समुपार्जित कर्म नियमसे पाया जाता है ॥८५४-८५८॥ विशेषार्थ-कृष्टिवेदक क्षपकके पूर्व भवमे तिर्यग्गति और मनुष्यगतिमे उत्पन्न होकर मॉधे हुए कर्मोंका अस्तित्व नियमसे रहता है, अतएव उनके संचयको संभव या असंभव की
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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