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________________ कसाय पाहुड सुत्त [ १५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार अपेक्षा गाथाकारने अभजितव्य कहा है । इसी वातको चूर्णिकारने 'नियम' पदसे द्योतित किया है । जिसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है- जो जीव तिर्यग्गति से आकर और मनुष्योंमें ही उत्पन्न होकर क्षपकश्रेणीपर चढ़ता है, उसके नियमसे तिर्यग्गतिमे वाँधे हुए कर्मोंका संचय पाया जाता है । किन्तु जो तिर्यग्गति से निकलकर और शेप नरक - देवादि गतियोमें सागरोपम-शतपृथक्त्वकाल तक परिभ्रमण कर क्षपकश्रेणीपर चढ़ता है, उसके भी तिर्थ - ग्गतिमें संचय किया हुआ कर्म नियमसे पाया जाता है । इसका कारण यह है कि तिर्यग्गतिमें उपार्जित कर्मस्थितिप्रमाण संचयका सागरोपमशतपृथक्त्वकाल के भीतर सर्वथा निर्जीर्ण होना असंभव है । इस प्रकार जहाँ कहीं भी कर्मस्थिति -प्र - प्रमाणकाल तक रह कर आये हुए क्षपकके मनुष्यगति-उपार्जित पूर्वभव संचित कर्मका सद्भाव नियमसे पाया जाता है । इस कारण 'दो गतियोमें पूर्ववद्ध कर्म अभजितव्य' कहे गये हैं । किन्तु कृष्टिवेदक क्षपकके देवगति - उपार्जित और नरकगति - उपार्जित पूर्वबद्ध कर्मका संचय भजितव्य कहा गया है । इसका कारण यह है कि देव या नरकगतिसे आकर तिर्यंच या मनुष्योमे ही कर्मस्थितिप्रमाण काल तक रहकर तदनन्तर क्षपकश्रेणीपर चढ़नेवाले जीवके देवगति - उपार्जित और नरकगति - उपार्जित कर्म नियम- ' से नहीं होता है । तथा जो देव - नारकियोंमे उत्पन्न होकर और वहॉ कितने ही काल तक रहकर तदनन्तर तियंचोमे उत्पन्न होकर वहाँ कर्मस्थिति - प्रमित या उससे अधिक काल तक रहकर और वहाँ नरक-देवगति - संचित कर्मपुंजको गलाकर तत्पश्चात् मनुष्यो में उत्पन्न होकर क्षपकश्र ेणीपर चढ़ता है, उसके भी नरक और देवगतिमे उपार्जित पूर्ववद्ध कर्मका एक भी परमाणु नही पाया जाता, क्योकि, कर्मस्थितिकाल व्यतीत हो जानेके पश्चात् उससे पहले बाँधे हुए कर्मके संचयका रहना असंभव है । किन्तु जो नरक और देवगतिमै प्रवेश करके वहाँ कुछ काल तक रहकर और फिर वहाँसे निकलकर कर्मस्थितिप्रमित कालके भीतर ही उस पूर्वोपार्जित कर्मसंचयके नष्ट हुए विना ही क्षपकश्रेणीपर चढ़ता है, उसके नरकगति संचित और देवगतिसंचित कर्म नियमसे पाया जाता है, क्योकि वह पूर्व-: -भव-संचित कर्मके गलाये विना ही क्षपकश्रेणीपर चढ़ा है । इस प्रकार देव और नरकगति-संचित पूर्ववद्ध कर्मकी भजनीयता सिद्ध हो जाती है । जिसप्रकार गतिमार्गणाकी अपेक्षासे पूर्वबद्ध कर्म-संचयके अस्तित्वनास्तित्वका विचार किया गया है, इसी प्रकार इन्द्रिय और कायमार्गणाका आश्रय लेकरके भी पूर्ववद्ध संचित कर्मकी भजनीयता - अभजनीयताका निर्णय कर लेना चाहिए | त्रसकायिको - मे इतनी बात विशेष जानना चाहिए कि संज्ञिपंचेन्द्रिय जीवोमे समुपार्जित पूर्ववद्ध कर्म भजनीय नही है, किन्तु द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञिपंचेन्द्रियोमे तथा लब्ध्यपर्याप्तक-संज्ञिपंचेन्द्रियोंमें पूर्ववद्ध कर्म भजनीय ही हैं, ऐसा नयधवलाकारका कहना है । जहाँ जिन पूर्ववद्ध कर्मोंकी संभवता है, वहाँ उनके एक परमाणुको आदि लेकर अनन्तकर्म-परमाणुओ तकका अस्तित्व संभव है, और जहाँ जिनकी संभवता नही है, वहाँ उनके एक भी परमाणुका अस्तित्व शेष नहीं समझना चाहिए । I ८२२
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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