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________________ गा० १७७] चारित्रमोहक्षपक कृष्टिवेदकक्रिया-निरूपण ८१७ पढमसमयकिट्टीवेदगस्स वे वस्साणि मोहणीयस्स हिदिसंतकम्मं । ८०७. लोभेण उवविदस्स पढमसमयकिट्टीवेदगस्स मोहणीयस्स द्विदिसंतकम्ममेकं वस्सं । ८०८. एत्तो विदियाए भासगाहाए समुक्त्तिणा । (१२४) जं किट्टि वेदयदे जवमझं सांतरं दुसु द्विदीसु । पढमा जं गुणसेढी उत्तरसेढी य विदिया दु॥१७७॥ ८०९. विहासा । ८१०. जहा । ८११. जं किट्टि वेदयदे तिस्से उदयहिदीए पदेसग्गं थोवं । ८१२ विदियाए द्विदीए पदेसग्गमसंखेज्जगुणं । ८१.३. एवमसंखेज्जगुणं जाव पढमहिदीए चरिमहिदि त्ति ।। ८१४. तदो विदियहिदीए जा आदिद्विदी तिस्से असंखेज्जगुणं । ८१५. तदो सव्वत्थ विसेसहीणं । ८१६. जवमज्झं पढमद्विदीए चरिमद्विदीए च, विदियट्ठिदीए आदिद्विदीए च । ८१७. एदं तं जवमझं सांतरं दुसु द्विदीसु । ८१८. एत्तो तदियाए भासग्राहाए समुक्त्तिणा । कृष्टिवेदकके मोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व दो वर्ष है और लोभसंज्वलनके उदयके साथ उपस्थित प्रथम समय कृष्टिवेदकके मोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व एक वर्ष है ।।८०३-८०७।। चूर्णिसू०-अब इससे आगे द्वितीय भाष्यगाथाकी समुत्कीर्तना करते हैं ॥८०८।। जिस कृष्टिको चेदन करता है, उसमें प्रदेशाग्रका अवस्थान यवमध्यरूपसे होता है और वह यवमध्य प्रथम तथा द्वितीय इन दोनों स्थितियोंमें वर्तमान हो करके भी अन्तर-स्थितियोंसे अन्तरित होनेके कारण सान्तर है। जो ग्रंथमस्थिति है, वह गुणश्रेणीरूप है अर्थात् उत्तरोत्तर समयों में प्रदेशाग्र असंख्यातगुणित क्रमसे उसमें अवस्थित हैं और जो द्वितीयस्थिति है, वह उत्तर श्रेणीरूप है अर्थात् आदि समयमें स्थूलरूप होकर भी वह उत्तरोत्तर समयोंमें विशेष हीनरूपसे अवस्थित है ॥१७७॥ चूर्णिसू०-अब उक्त भाष्यगाथाकी विभाषा की जाती है-जिस कृष्टिको वेदन करता है, उसकी उदयस्थितिमे प्रदेशाग्र अल्प हैं । द्वितीय स्थितिमे प्रदेशाग्र असंख्यातगुणित हैं। इस प्रकार असंख्यातगुणित क्रमसे प्रदेशाग्र प्रथम स्थितिके चरम समय तक बढ़ते हुए पाये जाते है । तदनन्तर द्वितीय स्थितिकी जो आदि स्थिति है, उसमे प्रदेशाग्र असंख्यातगुणित है । तत्पश्चात् सर्वत्र अर्थात् उत्तरोत्तर सर्व स्थितियोमें विशेप हीन क्रमसे प्रदेशाग्र अवस्थित हैं। यह प्रदेशाग्रोके विन्यासरूप यवमध्य प्रथम स्थितिके चरम स्थितिमे द्वितीय स्थितिके आदि स्थितिमे पाया जाता है। वह यह यवमध्य दोनो स्थितियोके अन्तिम और आदिम समयोमे वर्तमान है, अतएव सान्तर है ।।८०९-८१८॥ - चूर्णिसू०-अब इससे आगे तृतीय भाष्यगाथाकी समुत्कीर्तना की जाती है ।।८१८॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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