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________________ ८१८ कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार (१२५) विदियट्ठिदि आदिपदा सुद्धपुण होदि उत्तरपदं तु । सेसो असंखेजदिमो भागो तिस्से पदेसग्गे ॥१७८॥ ८१९. विहासा । ८२०. विदियाए द्विदीए उक्कस्सियाए पदेसग्गं तिस्से चेव जहणियादो द्विदीदो सुद्ध सुद्धसेसं पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागपडिभागियं । ८२१. एत्तो चउत्थीए भासगाहाए समुक्त्तिणा । ८२२. तं जहा । (१२६) उदयादि या द्विदीओ णिरंतरं तासु होइ गुणसेढी । उदयादि पदेसग्गं गुणेण गणणादियंतेण ॥१७९॥ ८२३. विहासा । ८२४. उदयट्ठिदिपदेसग्गं थोवं । ८२५. विदियाए हिदीसु पदेसग्गमसंखेज्जगुणं । ८२६. एवं सविस्से पडमट्टिदीए ।। द्वितीय स्थितिके आदिपद अर्थात् प्रथम निषेकके प्रदेशाग्रमेंसे उसके उत्तर पद अर्थात् चरम निषेकके प्रदेशाग्रको घटाना चाहिए। इस प्रकार घटानेपर जो असंख्यातवाँ भाग शेष रहता है, वह उस प्रथम निपेकके प्रदेशाग्रमें अधिक है ॥१७८॥ चूर्णिस०-अब इस भाष्यगाथाकी विभापा की जाती है-द्वितीय स्थितिकी उत्कृष्ट अर्थात् चरम स्थितिमे प्रदेशाग्र उस ही द्वितीय स्थितिकी जघन्य अर्थात् आदि स्थितिमेसे शोधित करना चाहिए । वह शुद्ध शेष पल्योपमके असंख्यातवें भागका प्रतिभागी है ।। ८१९-८२० विशेषार्थ-इस तीसरी भाष्यगाथामे द्वितीय स्थितिके उत्तरश्रेणी रूपसे अवस्थित प्रदेशाग्रका परम्परोपनिधारूपसे वर्णन किया गया है। जिसका अभिप्राय यह है कि द्वितीय स्थितिका आयाम यतः वर्षपृथक्त्वप्रमाण है, अतः उसके चरम निषेकके प्रदेशाग्रसे प्रथम निषेकका प्रदेशपिंड संख्यातगुणा, असंख्यातगुणा या अन्य प्रकारका न होकर नियमसे असंख्यातवाँ भाग अधिक होता है । यह असंख्यातवॉ भाग पल्योपमके असंख्यातवें भागके बरावर जानना चाहिए। चर्णिसू०-अब इससे आगे चौथी भाष्यगाथाकी समुत्कीर्तना की जाती है। वह इस प्रकार है ॥८२१-८२२॥ उदयकालसे आदि लेकर प्रथमस्थितिसम्बन्धी जितनी स्थितियाँ हैं, उनमें निरन्तर गुणश्रेणी होती है। उदयकालसे लेकर उत्तरोत्तर समयवर्ती स्थितियों में प्रदेशाग्र गणनाके अन्त अर्थात् असंख्यातगुणितरूपसे अवस्थित हैं ॥१७९॥ चूर्णिसू०-अब उक्त भाष्यगाथाकी विभाषा की जाती है-उदयस्थितिमे प्रदेशाग्र अल्प हैं । द्वितीय स्थितिमें प्रदेशाग्र असंख्यावगुणित हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण प्रथमस्थितिमे उत्तरोत्तर असंख्यातगुणित प्रदेशाग्र जानना चाहिए ॥८२३-८२६॥ विशेषार्थ-चौथी भाष्यगाथाके द्वारा पूर्वोक्त यवमध्यका स्पष्टीकरण करते हुए प्रथमस्थितिके प्रदेशाग्रका अवस्थान-क्रम सूचित किया गया है, जिसका अभिप्राय यह है कि
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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