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________________ गा० १७१ ] चारित्र मोहक्षपक कृष्टिगतविशेष- निरूपण ८१३ लोभस पढमा संग किट्टीए पदेसग्गं विसेसाहियं । ७६९ विदियाए संगह किट्टीए पदेसग्गं विसेसाहियं । ७७० तदियाए संगहकिट्टीए पदेसग्गं विसेसाहियं । ७७१. कोहस्स पाए संगट्टिीए पदेसग्गं संखेज्जगुणं । ७७२, विदियाए भासगाहाए समुक्कित्तणा । ७७३. तं जहा । ( ११८) विदिया दो पुण पढमा संखेज्जगुणा दु वग्गणग्गेण । विदियादो पुण तदिया कमेण सेसा विसेस हिया ॥ १७१ ॥ ७७४. विहासा । ७७५. जहा पदेसग्गेण विहासिदं तहा वग्गणग्गेण विहासिदव्वं । ७७६. एत्तो तदियाए भासगाहाए समुक्कित्तणा । ७७७. तं जहा । में प्रदेशाय विशेष अधिक हैं । मायाकी तृतीय संग्रहकृष्टिसे लोभकी प्रथम संग्रहकृष्टिमे प्रदेशाय विशेष अधिक हैं । द्वितीय संग्रहकृष्टिमें प्रदेशाय विशेष अधिक हैं । तृतीय संग्रहकृष्टिमें प्रदेशा विशेष अधिक हैं । लोभकी तृतीय संग्रहकृष्टिसे क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिमें प्रदेशा संख्यातगुणित हैं ।। ७५९-७७१ ॥ विशेषार्थ - यहाँ सर्वत्र स्वस्थानमे विशेष अधिकका प्रमाण पल्योपमके असंख्यातवें ariat प्रतिभागी और परस्थानमें आवलीके असंख्यातवें भागका प्रतिभागी जानना चाहिए । क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिमे प्रदेशाग्र संख्यातगुणित बतलाया है, सो वहॉपर संख्यातगुणितका अभिप्राय तेरहगुणा लेना चाहिए, जैसा कि ऊपर बतला आये हैं । चूर्णि सू०- ० - अब दूसरी भाष्यगाथाकी समुत्कीर्तना की जाती है । वह इस प्रकार है ॥ ७७२-७७३। क्रोधकी द्वितीय संग्रहकृष्टि से प्रथम संग्रहकृष्टि वर्गणाओंके समूहकी अपेक्षा संख्यातगुणी है । किन्तु क्रोधकी द्वितीय संग्रहकृष्टिसे तृतीय संग्रहकृष्टि विशेष अधिक । इसी क्रम से शेष अर्थात् मान, माया और लोभकी संग्रहकृष्टियाँ विशेष - विशेष अधिक जानना चाहिए ॥ १७१ ॥ चूर्णिसू० - अब उक्त भाष्यगाथाकी विभाषा कहते हैं - जिस प्रकार प्रदेशा की अपेक्षा कृष्टियोके अल्पबहुत्व की प्रथम भाष्यगाथाके द्वारा विभाषा की गई है, उसी प्रकार aurant अपेक्षा इस भाष्यगाथाकी विभाषा करना चाहिए ॥ ७७४-७७५॥ विशेषार्थ - इसका कारण यह है कि दोनो अपेक्षाओसे अल्पबहुत्वके निरूपण-क्रममें कोई भेद नहीं है । दूसरी बात यह है कि प्रदेशोकी हीनाधिकता के अनुसार ही वर्गणाओ में भी हीनाधिकता होती है । यहॉपर वर्गणा पदसे अनन्त परमाणुओके समुदायात्मक एक अन्तरकृष्टिका ग्रहण करना चाहिए । वर्गणाओंके समुदायको वर्गणाग्र कहते हैं । चूर्णिसू०० - अब इससे आगे तीसरी भाष्यगाथाकी समुत्कीर्तना करते हैं । वह इस प्रकार है ।। ७७६-७७७॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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