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________________ फसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार (११९) जा हीणा अणुभागेणहिया सा वग्गणा पदेसग्गे । भागेणऽणंतिमण दु अधिगा हीणा च बोद्धव्वा ॥१७२॥ ७७८. विहासा । ७७९ तं जहा । ७८०. जहणियाए वग्गणाए पदेसग्गं बहुअं । ७८१. विदियाए वग्गणाए पदेसग्गं विसेसहीणमणंतभागेण । ७८२. एवमणंतराणंतरेण विसेसहीणं सव्वत्थ । ७८३. ए तो चउत्थी भासगाहा । (१२०) कोधादिवग्गणादो सुद्धकोधस्स उत्तरपदं तु । सेसो अणंतभागो णियमा तिस्से पदेसग्गे ॥१७३॥ जो वर्गणा अनुभागकी अपेक्षा हीन है, वह प्रदेशाग्रकी अपेक्षा अधिक है । ये वर्गणाएँ अनन्तवें भागसे अधिक या हीन जानना चाहिए ॥१७२॥ विशेपार्थ-यह तीसरी भाष्यगाथा बारहो ही संग्रहकृष्टियोंकी जघन्य कृष्टिसे लेकर उत्कृष्ट कृष्टि तक यथाक्रमसे अवस्थित अन्तर-कृष्टियोके प्रदेशाग्रकी हीनाधिकताको अनन्तरोपनिधाके द्वारा बतलानेके लिए अवतीर्ण हुई है। इसका अर्थ यह है कि जो वर्गणा अनुभागकी अपेक्षा अधिक अनुभाग-युक्त होती है उसमें प्रदेश कम पाये जाते है और जो प्रदेशोकी अपेक्षा अधिक प्रदेश-समन्वित होती है उसमें अनुभागशक्ति हीन पाई जाती है। यहाँ जघन्यकृष्टिगत सदृश-सघनतावाले सर्व परमाणुओके समूहकी 'एक वर्गणा' यह संज्ञा दी गई है। इस प्रकार जघन्यसे लेकर उत्कृष्ट कृष्टि तक क्रमसे अवस्थित कृष्टियोमे सर्व-अधस्तन वर्गणा अनुभागकी अपेक्षा हीन है और उपरिम-उपरिम वर्गणाएँ क्रमशः अनन्तगुणित वृद्धिरूपसे अधिक अनुभागसे युक्त हैं । जिस प्रकार उपरिम-उपरिम वर्गणाएँ अनुभागकी अपेक्षा अधिक हैं । उसी प्रकार वे प्रदेशोकी अपेक्षा ऊपर-ऊपर हीन है, क्योकि वर्गणाओका ऐसा ही स्वभाव है कि जिनमें अनुभाग अधिक होगा, उनमें प्रदेशाग्र कम होगा और जिनमें प्रदेश-समुदाय अधिक होगा, उनमे अनुभाग कम होगा। इस प्रकार यह गाथाके पूर्वार्धका अर्थ हुआ । गाथाके उत्तरार्ध-द्वारा यह सूचित किया गया है कि यह उपयुक्त हीनाधिकता अनन्तवें भागप्रमाण जानना चाहिए । अर्थात् एक अन्तर-कृष्टिसे दूसरी अन्तर-कृष्टि अनुभाग या प्रदेशाग्रकी अपेक्षा एक वर्गणासे हीन या अधिक होती है। चूर्णिसू०-अब उक्त भाष्यगाथाकी विभाषा की जाती है। वह इस प्रकार हैजघन्य वर्गणामे प्रदेशाग्र बहुत है । द्वितीय वर्गणामें प्रदेशाग्र विशेप हीन अर्थात् अनन्तवें भागसे हीन होते हैं । इस प्रकार अनन्तर अनन्तर क्रमसे सर्वत्र विशेप हीन प्रदेशाग्र जानना चाहिए ॥७७८-७८१॥ चूर्णिसू०-अव इससे आगे चौथी भाण्यगाथा अवतरित होती है ॥७८३॥ __क्रोधकपायका उत्तरपद अर्थात् चरम कृष्टिका प्रदेशाग्र क्रोधकपायकी आदि अर्थात् जघन्य वर्गणामेंसे घटाना चाहिए। इस प्रकार घटानेपर जो शेष अनन्तवॉ भाग बचता है, वह नियमसे क्रोधकी जघन्य वर्गणाके प्रदेशाग्रमें अधिक है ॥१७३॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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