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________________ गा० १६७] चारित्रमोहक्षपक कृष्टिगतविशेष-निरूपण ७३७. एदिस्से वे भासगाहाओ । ७३८. मूलगाहापुरिमद्ध एका भासगाहा । ७३९. तिस्से समुक्त्तिणा। (११४) किट्टी च द्विदिविसेसेसु असंखेजेसु णियमसा होदि । णियमा अणुभागेसु च होदि हु किट्टी अणंतेसु ॥१६७॥ ७४०. विहासा । ७४१. कोधस्स पडमसंगहकिट्टि वेदेंतस्स तिस्से संगहकिट्टीए एकेका किट्टी विदियट्टिदीसु सव्वासु पढमद्विदीसु च उदयवज्जासु एकेका किट्टी सव्वासु द्विदीसु । चूर्णिसू०-इस मूलगाथाका अर्थ-व्याख्यान करनेवाली दो भाष्यगाथाएँ हैं। उनमेंसे मूलगाथाके पूर्वार्धके अर्थ में एक भाष्यगाथा निबद्ध है। उसकी समुत्कीर्तना इस प्रकार है ॥७३७-७३९॥ सभी कृष्टियाँ सर्व असंख्यात स्थिति-विशेषोंपर नियमसे होती हैं। तथा प्रत्येक कृष्टि नियमसे अनन्त अनुभागोंमें होती है ॥१६७॥ विशेषार्थ-सभी कृष्टियाँ सर्व असंख्यात स्थितिविशेषोंपर नियमसे होती हैं, इसका अभिप्राय यह है कि चारो संज्वलनोकी द्वितीयस्थिति संख्यात आवलीप्रमाण होती है । उनमें एक-एक स्थितिपर सर्व संग्रहकृष्टियाँ और उनकी अवयवकृष्टियाँ पाई जाती हैं । यहाँ इतना विशेष और जानना चाहिए कि वेद्यमान संग्रहकृष्टि और उसकी अवयवकृष्टियाँ प्रथमस्थिति-सम्बन्धी सर्व स्थितियोमें भी संभव हैं । इसीप्रकार प्रत्येक संग्रहकृष्टि और उनकी अवयवकृष्टियाँ अनन्त अविभागप्रतिच्छेदवाले सर्व अनुभागोमे पाई जाती है, इसलिए जघन्य भी कृष्टि अविभाग-प्रतिच्छेदोके गणनाकी अपेक्षा अनन्त संख्यावाले अनुभागसे समन्वित होती है। इसी प्रकार शेष भी कृष्टियाँ अनन्त अविभागप्रतिच्छेद शक्ति-समन्वित अनुभागवाली जानना चाहिए। चूर्णिसू०- अब उक्त भाष्यगाथाकी विभाषा की जाती है-क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिको वेदन करनेवाले जीवके उस संग्रहकृष्टिकी एक-एक अवयवकृष्टि द्वितीयस्थिति-सम्बन्धी सर्व अवयवस्थितियोंमें और प्रथमस्थिति-सम्बन्धी केवल एक उदयस्थितिको छोड़कर शेप सर्व स्थितियोमे पाई जाती हैं ॥७४०-७४१॥ विशेषार्थ-क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिको वेदन करनेवाले जीवके उस अवस्थामे क्रोध संज्वलनकी प्रथमस्थिति और द्वितीय-स्थितिसंज्ञावाली दो स्थितियाँ होती है। उनमें द्वितीय स्थितिसम्बन्धी एक-एक समयरूप जितनी अवयवस्थितियाँ है, उन सबमे वेदनकी जानेवाली क्रोध-प्रथम संग्रहकृष्टिकी जितनी अवयव-कृष्टियाँ हैं, वे सब पाई जाती है। किन्तु प्रथमस्थितिसम्बन्धी जितनी अवान्तर-स्थितियाँ है, उनमे केवल एक उदयस्थितिको छोड़कर शेष सर्व अवान्तर-स्थितियोमे क्रोधकपायसम्बन्धी प्रथम संग्रहकृष्टिकी सर्व अवयवकृष्टिचॉ पाई जाती
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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