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________________ ८०८ कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार ७२६. विहासा । ७२७ लोभस्स जहणिया किट्टी अणुभागेहिं थोवा । ७२८. विदियकिट्टी अणुभागेहिं अणंतगुणा । ७२९. तदिया किट्टी अणुभागेहिं अणंतगुणा । ७३०. एवमणंतराणंतरेण सव्वत्थ अणंतगुणा जाव कोधस्स चरिमकिट्टि त्ति । ७३१. उक्कस्सिया वि किट्टी आदिफद्दय आदिवग्गणाए अणंतभागो । ७३२. एवं किट्टीसु थोवो अणुभागो । ७३३ किसं कम्मं कदं जम्हा, तम्हा किट्टी । ७३४. एदं लक्खणं । ___७३५. एत्तो विदियमूलगाहा । ७३६. तं जहा। (११३) कदिसु च अणुभागेसु च हिदीसु वा केत्तियासु का किट्टी । सव्वासु वा द्विदीसु च आहो सव्वासु पत्तेयं ॥१६६॥ अर्थात् अन्तिम उत्कृष्ट कृष्टि तक यथाक्रमसे अवस्थित चारों संज्वलन कपायरूप कर्मके अनुभागमें गुणश्रेणी अनन्तगुणित है, यह कृष्टि का लक्षण है ॥१६५॥ विशेषार्थ-गाथामे कृष्टिका लक्षण पश्चादानुपूर्वीसे कहा गया है । जिसके द्वारा संज्वलन कपायोका अनुभाग सत्त्व उत्तरोत्तर कृश अर्थात् अल्पतर किया जाय, उसे कृष्टि कहते है । पूर्वानुपूर्वीकी अपेक्षा संज्वलन क्रोधकी उत्कृष्ट कृष्टिसे लेकर लोभकषायकी जघन्य कृष्टि तक कपायोका अनुभाग उत्तरोत्तर अनन्तगुणित हानिरूपसे कृश होता जाता है, इस वातको गाथाकारने पश्चादानुपूर्वीकी अपेक्षा कहा है कि लोभ कपायकी जघन्य कृष्टिसे लेकर क्रोधकपायकी उत्कृष्ट कृष्टि तक कषायोका अनुभाग अनन्तगुणित वृद्धिरूप है । इस प्रकार इस गाथाके द्वारा कृष्टिका लक्षण कहा गया है। चूर्णिसू०-अव उक्त भाष्यगाथाकी विभापा करते हैं-लोभकी जघन्य कृष्टि अनु. भागकी अपेक्षा सबसे कम है । द्वितीय कृष्टि अनुभागकी अपेक्षा अनन्तगुणी है। तीसरी कृष्टि अनुभागकी अपेक्षा अनन्तगुणी है । इस प्रकार अनन्तर-अनन्तर क्रमसे सर्वत्र तब तक कृष्टियोका अनुभाग अनन्तगुणित जानना चाहिए, जवतक कि क्रोधकी अन्तिम उत्कृष्ट कृष्टि प्राप्त हो । संज्वलन क्रोधकी उत्कृष्ट भी कृष्टि प्रथम अपूर्व स्पर्धककी आदि वर्गणाके अनन्तवें भाग है। इस प्रकार कृष्टियोमें अनुभाग उत्तरोत्तर अल्प है । यतः जिसके द्वारा संज्वलन कपायरूप कर्म कृश किया जाता है, अतः उसकी कृष्टि यह संज्ञा सार्थक है। यह कृष्टिका लक्षण है ।।७२६-७३४॥ चूर्णिसू०-अव इससे आगे दूसरी मूलगाथा अवतरित होती है। वह इस प्रकार है ॥७३५-७३६॥ कितने अनुभागोंमें और कितनी स्थितियोंमें कौन कृष्टि वर्तमान है ? यदि प्रथम, द्वितीयादि सभी स्थितियों में सभी कृष्टियाँ संभव हैं, तो क्या उनकी सभी अवयवस्थितियोंमें भी अविशेषरूपसे सभी कृष्टियाँ संभव हैं, अथवा प्रत्येक स्थितिपर एक-एक कृष्टि संभव है ? ॥१६६॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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