SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 906
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ७९८ फसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार मस्सकण्णकरणेणेव आगाइदं । ५८७. अण्णं डिदिखंडयं चतुण्डं घादिकम्माणं संखेजाणि वस्ससहस्साणि । ५८८. णामा-गोद-वेदणीयाणमसंखेज्जा भागा। ५८९. पढमसमयकिट्टीकारगो कोधादो पुवफदएहितो च अपुव्वफदएहिंतो च पदेसग्गयोकड्डियण कोहकिट्टीओ करेदि । माणादो ओकड्डियूण माणकिट्टीओ करेदि । मायादो ओकड्डियण मायाकिट्टीओ करेदि । लोभादो ओकड्डियूण लोभकिट्टीओ करेदि । ५९०. एदाओ सव्याओ वि चउबिहाओ किट्टीओ एयफदयवग्गणाणमणंतभागो पगणणादो। ५९१.पढमसमए णिव्यत्तिदाणं किट्टीणं तिव्य-मंददाए अप्पाबहुअं वत्तइस्सामो। ५९२. तं जहा । ५९३. लोभस्स जहणिया किट्टी थोवा । ५९४. विदिया किट्टी अणंतगुणा । ५९५. एवमणंतगुणाए सेढीए जाव पढमाए संगहकिट्टीए चरिमकिट्टि त्ति । ५९६. तदो विदियाए संगहकिट्टीए जहणिया किट्टी अणंतगुणा । ५९७ एस गुणगारो वारसण्हं पि संगहकिट्टीणं सत्थाणगुणगारेहिं अणंतगुणो । ५९८. विदियाए संगहकिट्टीए सो चेव कमो जो पढमाए संगहकिट्टीए । ५९९. तदो पुण विदियाए च तदियाए च संगहकिट्टीणमंतरं तारिसं चेव । ६००. एवमेदाओ लोभस्स तिणि संगहकिट्टीओ। स्थितिबन्ध होता है। ( यहाँपर चारों संज्वलनोंका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त कम आठ वर्ष है और शेष कर्मोंका स्थितिवन्ध पूर्वके स्थितिवन्धसे संख्यातगुणा हीन है । ) अन्य अनुभागकांडक अश्वकर्णकरणकारकके द्वारा ही ग्रहण किया गया है। उस समय अन्य स्थितिकांडक होता है जो कि चारो घातिया कर्मोंका संख्यात सहस्र वर्ष है और नाम, गोत्र तथा वेदनीयका असंख्यात बहुभाग है। प्रथमसमयवर्ती कृष्टिकारक क्रोधके पूर्वस्पर्धकोसे और अपूर्वस्पर्धकोसे प्रदेशाग्रका अपकर्पण कर क्रोध-कृष्टियोको करता है। मानसे प्रदेशाग्र का अपकर्षण कर मान-कृष्टियोको करता है। मायासे प्रदेशाग्रका अपकर्षण कर माया-कृष्टियोको करता है और लोभसे प्रदेशाग्रका अपकर्पण कर लोभ-कृष्टियो को करता है। ये सब चारो ही प्रकारकी कृष्टियाँ गणनाकी अपेक्षा एक स्पर्धककी वर्गणाओके अनन्तवे भागप्रमाण हैं ॥५८३-५९०॥ चूर्णिसू०-अव प्रथम समयमें निवृत्त हुई कृष्टियोकी तीव्र-मन्दताके अल्पबहुत्वको कहेगे । वह इस प्रकार है-( यहॉपर संज्वलन क्रोधादि प्रत्येक कपायकी तीन-तीन कृष्टियोकी रचना करना चाहिए । इस प्रकार चारो कपायोकी बारह कृष्टियाँ होती हैं । ) लोभकी जघन्य कृष्टि वक्ष्यमाण कृष्टियोकी अपेक्षा सबसे अल्प है । द्वितीय कृष्टि अनन्तगुणी है । इस प्रकार अनन्तगुणित श्रेणीसे प्रथम संग्रहकृष्टिकी अन्तिम कृष्टि तक जानना चाहिए । पुनः उस प्रथम संग्रहकृष्टिकी अन्तिम कृष्टिसे द्वितीय संग्रहकृष्टिकी जघन्य कृष्टि अनन्तगुणी है । यह गुणकार वारहो ही संग्रह-कृष्टियोके स्वस्थानगुणकारोसे अनन्तगुणा है। प्रथम संग्रहकृष्टिमें जो क्रम है वही क्रम द्वितीय संग्रहकृष्टिमें भी है । पुनः इससे आगे द्वितीय और तृतीय संग्रहकृष्टियोंका तादृश ही क्रम है अर्थात् प्रथम और द्वितीय संग्रहकृष्टियोके अन्तरके सदृश ही
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy