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________________ गा० १६१] चारित्रमोहक्षपक कृष्टिकरणक्रिया-निरूपण ७९९ ६०१. लोभस्स तदियाए संगहकिट्टीए जा चरिमा किट्टी तदो मायाए जहण्णकिट्टी अणंतगुणा । ६०२. मायाए वि तेणेव कमेण तिष्णि संगहकिट्टीओ। ६०३. मायाए जा तदिया संगहकिट्टी तिस्से चरिमादो किट्टीदो माणस्स जहणिया किट्टी अणंतगुणा । ६०४. माणस्स वि तेणेव कमेण तिण्णि संगहकिट्टीओ। ६०५. माणस्स जा तदिया संगहकिट्टी तिस्से चरिमादो किट्टीदो कोधस्स जहणिया किट्टी अणंतगुणा । ६०६. कोहस्स वि तेणेव कमेण तिण्णि संगहकिट्टीओ । ६०७. कोधस्स तदियाए संगहकिट्टीए जा चरिमकिट्टी तदो लोभस्स अपुयफयाणमादिवग्गणा अणंतगुणा । ६०८. किट्टीअंतराणयप्पाबहुअं वत्तइस्सामो । ६०९. अप्पाबहुअस्स लहुआलाव-संखेवपदत्थसण्णाणिक्खेवो ताव कायव्यो । ६१०. तं जहा । ६११. एककिस्से संगहकिट्टीए अणंताओ किट्टीओ। तासिं अंतराणि वि अणंताणि । तेसिमंतराणं सण्णा किट्टी-अंतराई णाम । संगहकिट्टीए च संगहकिट्टीए च अंतराणि एक्कारस । तेसिं सण्णा संगहकिट्टी-अंतराई णाम । ६१२. एदीए णामसण्णाए किट्टीअंतराणं संगहकिट्टीअंतराणं च अप्पाबहुअं वत्तइस्सामो। ६१३. तं जहा । ६१४. लोभस्स पहमाए संगहकिट्टीए जहण्णयं किट्टीअंतरं थोवं । ६१५. विदियं किट्टीअंतरमणंतगुणं । ६१६. एवमणंतराणंहै । इस प्रकार ये लोभकी तीन संग्रहकृष्टियाँ है । लोभकी तृतीय संग्रहकृष्टिकी जो अन्तिम कृष्टि है उससे मायाकी जघन्य कृष्टि अनन्तगुणी है । मायाकी भी उसी ही क्रमसे तीन संग्रहकृष्टियाँ होती हैं। मायाकी जो तृतीय संग्रहकृष्टि है उसकी अन्तिम कृष्टिसे मानकी जघन्य कृष्टि अनन्तगुणी होती है। मानकी भी उसी ही क्रमसे तीन संग्रह कृष्टियाँ होती है । मानकी जो तृतीय संग्रहकृष्टि है उसकी अन्तिम कृष्टिसे क्रोधकी जघन्य कृष्टि अनन्तगुणी होती है। क्रोधकी भी उसी क्रमसे तीन संग्रहकृष्टियाँ होती है। क्रोधकी तृतीय संग्रहकृष्टिकी जो अन्तिम कृष्टि है उससे लोभके अपूर्वस्पर्धकोकी आदिवर्गणा अनन्तगुणी होती है ।।५९१-६०७॥ चूर्णिसू०-अब कृष्टियोके अन्तरोका अर्थात् कृष्टि-सम्बन्धी गुणकारीका अल्पवहुत्व कहेगे। प्रकृत अल्पवहुत्वके लघु-आलाप करनेके लिए संक्षेप पदोका अर्थ-संज्ञारूप निक्षेप पहले करना चाहिए । अर्थात् प्रस्तुत किये जानेवाले विस्तृत अल्पवहुत्वको संक्षेपमे कहनेके लिए पदोंकी संक्षेपरूपमे अर्थ-संज्ञा कर लेना चाहिए जिससे प्रकृत कथनका सुगमतासे बोध हो सके । वह संज्ञा इस प्रकार करना चाहिए-एक-एक संग्रहकृष्टिकी अनन्त कृष्टियाँ होती है और उनके अन्तर भी अनन्त होते हैं। उन अन्तरोकी 'कृष्टि-अन्तर' यह संज्ञा है । संग्रहकृष्टियोके और संग्रह-कृष्टियोके अधस्तन-उपरिम अन्तर ग्यारह होते है, उनकी संज्ञा 'संग्रहकृष्टि-अन्तर' ऐसी है। इस प्रकारसे की गई नामसंज्ञाके द्वारा कृष्टि-अन्तरोका और संग्रहकृष्टि-अन्तरोका अल्पबहुत्व कहेंगे । वह इस प्रकार है-लोभकी प्रथम संग्रहकृष्टिम जघन्य कृष्टि-अन्तर अर्थात् जिस गुणकारसे गुणित जघन्य कृष्टि अपने द्वितीय कृष्टिका प्रमाण प्राप्त करती है, वह गुणकार सवसे कम हैं। इससे द्वितीय कृष्टिका अन्तर अनन्तगुणा है। इस
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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