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________________ गा० १६१] चारित्रमोहक्षपक-कृष्टिकरणक्रिया-निरूपण ওৎও हियाओ। ५६८. मायाए अपुचफयवग्गणाओ विसेसाहियाओ। ५६९. लोभस्स अपुवफद्दयवग्गणाओ विसेसाहियाओ । ५७०. लोभस्स पुयफदयाणि अणंतगुणाणि । ५७१. तेसिं चेव वग्गणाओ अणंतगुणाओ । ५७२. मायाए पुव्वफद्दयाणि अणंतगुणाणि । ५७३. तेसिं चेव वग्गणाओ अणंतगुणाओ । ५७४. माणस्स पुचफयाणि अणंतगुणाणि । ५७५. तेसिं चेव वग्गणाओ अणंतगुणाओ । ५७६ कोहस्स पुव्वफयाणि अणंतगुणाणि । ५७७. तेसिं चेव वग्गणाओ अणंतगुणाओ । ५७८. एवमंतोमुहुत्तमस्सकण्णकरणं । ५७९. अस्सकण्णकरणस्स चरिमसमए संजलणाणं द्विदिवंधो अट्ठ वस्साणि । ५८०. सेसाणं कम्माणं द्विदिवंधो संखेजाणि वस्ससहस्साणि । ५८१. णामा-गोदवेदणीयाणं द्विदिसंतकम्ममसंखेज्जाणि वस्साणि । ५८२. चउण्हं घादिकम्माणं द्विदिसंतकम्मं संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि । ५८३. एत्तो से कालप्पहुडि किट्टीकरणद्धा । ५८४ छसु कम्मेसु संछुद्धसु जो कोधवेदगद्धा तिस्से कोधवेदगद्धाए तिण्णि भागा। जो तत्थ पहमतिभागो अस्सकण्णकरणद्धा, विदियो तिभागो किट्टीकरणद्धा, तदियतिभागो किट्टीवेदगद्धा । ५८५. अस्सकण्णकरणे णिट्ठिदे तदो से काले अण्णो द्विदिबंधो । ५८६. अण्णमणुभागखंडयअनन्तगुणी हैं। इससे मानकी अपूर्वस्पर्धक वर्गणाएँ विशेप अधिक है। इससे मायाकी अपूर्वस्पर्धक-वर्गणाएँ विशेप अधिक है। इससे लोभकी अपूर्वस्पर्धक-वर्गणाएँ विशेष अधिक है ॥५५८-५६९॥ चूर्णिसू०-लोभकी अपूर्वस्पर्धक-वर्गणाओसे लोभके पूर्वस्पर्धक अनन्तगुणित है। लोभके पूर्वस्पर्धकोसे उन्हीकी वर्गणाएँ अनन्तगुणी है । लोभके पूर्वस्पर्धकोकी वर्गणाओसे मायाके पूर्वस्पर्धक अनन्तगुणित हैं । मायाके पूर्वस्पर्धकोसे उन्हीकी वर्गणाएँ अनन्तगुणित है । मायाके पूर्वस्पर्धकोकी वर्गणाओसे मानके पूर्वस्पर्धक अनन्तगुणित हैं । मानके पूर्वस्पर्धको से उन्हींकी वर्गणाएँ अनन्तगुणी है। मानके पूर्वस्पर्धकोकी वर्गणाओसे क्रोधके पूर्वस्पर्धक अनन्तगुणित है। क्रोधके पूवस्पर्धकोसे उन्हींकी वर्गणाएँ अनन्तगुणी हैं। इस प्रकार अन्तर्मुहूर्तकालतक अश्वकर्णकरण प्रवर्तमान रहता है ॥५७०.५७८॥ चूर्णिसू०-अश्वकर्णकरणके अन्तिम समयमे चारो संज्वलनोका स्थितिबन्ध आठ वर्प और शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्प है । नाम, गोत्र और वेदनीय कर्मोंका स्थितिसत्त्व असंख्यात वर्प है और चागे घातिया कर्मोंका स्थितिसत्त्व संख्यात सहस्र वर्प है। इस प्रकार अश्वकर्णकरणका काल समाप्त होता है ॥५७९-५८२॥ चूर्णिस०-यहॉसे आगे अनन्तर समयसे लेकर कृष्टिकरणकाल है। हास्यादि छह कर्मोंके संक्रमणको प्राप्त होनेपर जो क्रोधवेदककाल है उस क्रोधवेदककालके तीन भाग हैं। उनमे जो प्रथम विभाग है, वह अश्वकर्णकरणकाल, द्वितीय विभाग कृष्टिकरणकाल और तृतीय विभाग कृष्टिवेदककाल है। अश्वकर्णकरणके समाप्त होनेपर तदनन्तरकालमे अन्य
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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