SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 904
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ७९६ कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार तेण परं सव्वम्हि अस्सकण्णकरणे एस कमो । ५४९. पढमसमए अपुव्यफहयाणि णिव्यत्तिदाणि बहुआणि । ५५०. विदियसमए जाणि अपुव्वाणि अपुयफव्याणि कदाणि ताणि असंखेज्जगुणहीणाणि । ५५१. तदियसमए अपुव्याणि अपुव्वफद्दयाणि कदाणि ताणि असंखेज्जगुणहीणाणि । ५५२. एवं समए समए जाणि अपुव्याणि अपुव्वफद्दयाणि कदाणि ताणि असंखेज्जगुणहीणाणि । ५५३. गुणगारो पलिदोयमवरगमूलस्स असंखेज्जदिभागो। ५५४. चरिमसमए लोभस्स अपुव्यमद्दयाणमादिवग्गणाए अविभागपलिच्छेदग्गं थोवं । ५५५. विदियस्स अपुचफद्दयस्स आदिवग्गणाए अविभागपडिच्छेदग्गं दुगुणं । ५५६. तदियस्स अपुव्वफदयरस आदिवग्गणाए अविभागपलिच्छेदग्गं तिगुणं । ५५७. एवं मायाए माणस्स कोहस्स च । ५५८. अस्सकण्णकरणस्स पढमे अणुभागखंडए हदे अणुभागस्स अप्पाबहुअं वत्तइस्सामो । ५५९. तं जहा । ५६०. सव्वत्थोवाणि कोहस्स अपुव्वफद्दयाणि । ५६१. माणस्स अपुजफद्दयाणि विसेसाहियाणि । ५६२.मायाए अपुवफद्दयाणि विसेसाहियाणि । ५६३. लोभस्स अपुव्वफयाणि विसेसाहियाणि । ५६४. एयपदेसगुणहाणिहाणंतरफदयाणि असंखेज्जगुणाणि । ५६५. एयफद्दयवग्गणाओ अणंतगुणाओ । ५६६. कोधस्स अपुव्यफद्दयवग्गणाओ अणंतगुणाओ । ५६७. पाणस्स अपुव्यफद्दयवग्गणाओ विसेसासंज्वलन क्रोधमें अनुभागसत्त्व अनन्तगुणा है । इससे आगे सम्पूर्ण अश्वकर्णकरणके कालमे भी यही क्रम है । अश्वकर्णकरणके प्रथम समयमे निर्वर्तित अपूर्वस्पर्धक बहुत है। द्वितीय समयमे जिन अपूर्व अपूर्वस्पर्धकोको निर्वृत्त किया है, वे असंख्यातगुणित हीन है। तृतीय समयमे जो अपूर्व अपूर्वस्पर्धक निवृत्त किये हैं, वे असंख्यातगुणित हीन हैं । इस प्रकार उत्तरोत्तर समयोमें जो अपूर्व अपूर्वस्पर्धक निवृत्त किये है वे उत्तरोत्तर असंख्यातगुणित हीन हैं । यहॉपर गुणकार पल्योपमके वर्गमूलका असंख्यातवॉ भाग है ।।५४२-५५३॥ चूर्णिस०-अश्वकर्णकरणके अन्तिम समयमे लोभके अपूर्वस्पर्धकोकी आदि वर्गणामे अविभागप्रतिच्छेदाग्र अल्प हैं। इससे द्वितीय अपूर्वस्पर्धककी आदिवर्गणामे अविभागप्रतिच्छेदान दुगुने है। इससे तृतीय अपूर्व स्पर्धककी आदि वर्गणामे अविभागप्रतिच्छेदाग्र तिगुने हैं । ( इस प्रकार चतुर्थ-पंचमादि अपूर्वस्पर्धकोके चौगुने पंचगुने आदि अविभागप्रतिच्छेदाग्र जानना चाहिए । ) इसी प्रकार माया, मान और क्रोधके अपूर्वस्पर्धको अविभागप्रतिच्छेदानसम्बन्धी अल्पबहुत्वको जानना चाहिए ॥५५४-५५७।। चूर्णिसू०-अव अञ्चकर्णकरणके प्रथम अनुभागकांडकके नष्ट होनेपर अनुभागका अल्पवहुत्व कहेगे। वह इस प्रकार है-क्रोधके अपूर्वस्पर्धक सबसे कम है। इससे मानके अपूर्वस्पर्धक विशेप अधिक हैं। इससे मायाके अपूर्वस्पर्धक विशेप अधिक हैं । इससे लोभके अपूर्वस्पर्धक विशेष अधिफ हैं। इससे एक प्रदेशगुणहानिस्थानान्तरके स्पर्धक असंख्यातगुणित हैं। इससे एक स्पर्धककी वर्गणाएँ अनन्तगुणी है। इससे क्रोधी अपूर्व स्पर्धक-वर्गणाएँ
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy