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________________ गा० १६१] चारित्रमोहक्षपक-अश्वकर्णकरणक्रिया-निरूपण ४९०, तम्मि चेव परमसमए अपुच्चफद्दयाणि' णाम करेदि । ४९१. तेसिं परूवणं वत्तइस्सामो। ४९२. तं जहा । ४९३. सबस्स अक्खवगस्स सचकम्माणं देसघादिफयाणमादिवग्गणा तुल्ला । सव्वधादीणं पि मोत्तूण मिच्छत्तं सेसाणं कम्माणं सव्वधादीणमादिवग्गणा तुल्ला । एदाणि पुव्वफद्दयाणि णाम । ४९४. तदो चदुण्हं संजलणाणमपुवफद्दयाई णाम करेदि । ४९५. ताणि कधं करेदि ? ४९६. लोभस्स ताव लोहसंजलणस्स पुव्वफद्दएहितो पदेसग्गस्स असंखेज्जदिभागं घेत्तण परमस्स देसघादिरुद्दयस्स हेट्ठा अणंतभागे अण्णाणि अपुन्वफयाणि णिवत्तयदि । ४९७. ताणि पगणणादो अणंताणि पदेसगुणहाणिहाणंतरफद्दयाणमसंखेज्जदिभागो एत्तियमेत्ताणि ताणि अपुवफदयाणि । चूर्णिसू०-अश्वकर्णकरण करनेके उसी ही प्रथम समयमें चारो संज्वलन-कषायोंके अपूर्वस्पर्धक करता है ॥४९०॥ विशेषार्थ-जिन स्पर्धकोंको पहले कभी प्राप्त नहीं किया, किन्तु जो क्षपकश्रेणीमें ही अश्वकर्णकरणके कालमे प्राप्त होते है और जो संसारावस्थामे प्राप्त होनेवाले पूर्वस्पर्धकोंसे अनन्तगुणित हानिके द्वारा क्रमशः हीयमान स्वभाववाले हैं, उन्हे अपूर्व-स्पर्धक कहते हैं । चूर्णिसू०-अब उन अपूर्वस्पर्धकोकी प्ररूपणा कहेगे । वह इस प्रकार है-सर्व अक्षपक जीवोके सभी कर्मोंके देशघाती स्पर्धकोकी आदिवर्गणा तुल्य है। सर्वघातियोमे भी केवल मिथ्यात्वको छोड़कर शेप सर्वघाती कर्मोंकी आदि वर्गणा तुल्य है। इन्हींका नाम पूर्वस्पर्धक है । तत्पश्चात् वही प्रथमसमयवर्ती अवेदी जीव उन पूर्वस्पर्धकोसे चारो संज्वलनकषायोंके अपूर्वस्पर्धकोको करता है ॥४९१-४९४॥ शंका-उन अपूर्वस्पर्धकोको किस प्रकार करता है ? ॥४९५।। समाधान-यद्यपि यह प्रथमसमयवर्ती अवेदक क्षपक चारो ही कषायोके अपूर्वस्पर्धकोको एक साथ ही निवृत्त करता है, तथापि (सबका एक साथ कथन अशक्य है, अतः) पहले लोभके अपूर्वस्पर्धक करनेका विधान कहेगे-संज्वलनलोभके पूर्वस्पर्धकोसे प्रदेशाग्रके असंख्यातवे भागको ग्रहणकर प्रथम देशघाती स्पर्धकके नीचे अनन्तवें भागमे अन्य अपूर्वस्पर्धक निर्वृत्त करता है । वे यद्यपि गणनाकी अपेक्षा अनन्त हैं, तथापि प्रदेशगुणहानिस्थानान्तरके स्पर्धकोके असंख्यातवें भागका जितना प्रमाण है, उतने प्रमाण वे अपूर्वस्पर्धक होते हैं ॥४९६-४९७।। १ काणि अपुवफद्दयाणि णाम १ ससारावस्थाए पुवमलद्ध पसरूवाणि खवगसेढीए चेव अस्सकष्णकरणद्धाए समुवल्ल्भमाणसरूवाणि पुवफद्दएहिंतो अण तगुणहाणीए ओवट्टिजमाणसहावाणि जाणि फद्दयाणि ताणि अपुवफद्दयाणि त्ति भण्ण ते । जयध । वर्धमान मत पूर्व हीयमानमपूर्वकम् । स्पर्धक द्विविधं जेय स्पर्धकक्रमकोविदैः॥ पचस० १,४६ ।। २ पुव्वफद्दयाणमादिवग्गणा एगेगवग्गणविसेसेण हीयमाणा जम्हि उद्देसे दुगुणहीणा होदि तमदाणमेगं गुणहाणिठ्ठाणतर णाम । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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