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________________ कसाच पाहुड सुत [ १५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार अस्सकण्णकरण कारगो । ४७४ ताथे ट्ठिदिसंतकम्मं संजलणाणं संखेज्जाणि वस्ससह - स्पाणि । ४७५. ठिदिबंधो सोलस वस्साणि अंतोमुहुत्तूणाणि । ४७६. अणुभागसंतकम्मं सह आगाइदेण माणे थोवं । ४७७ कोहे विसेसाहियं । ४७८. मायाए विसेसाहियं । ४७९. लोभे विसेसाहियं । ४८०, बंधो वि एवमेव । ४८१. अणुभागखंडयं पुण जमागाइदं तस्स अणुभागखंडयस्स फद्दयाणि कोधे थोवाणि । ४८२. माणे फद्दयाणि विसेसाहियाणि । ४८३ मायाए फद्दयाणि विसेसाहियाणि । ४८४. लोभे फद्दयाणि विसेसाहियाणि । ४८५ आगाइदसेसाणि पुण फद्दयाणि लोभे थोवाणि । ४८६. मायाए अनंतगुणाणि । ४८७. माणे अनंतगुणाणि । ४८८. कोधे अनंतगुणाणि । ४८९. एसा परूवणा पढमसमय अस्सकण्णकरण कारयस्स | ७८८ होता है । अर्थात् अवेदी होनेके प्रथम समयमें ही अश्वकर्णकरण करता है । उस समय संज्वलन कषायोंका स्थितिसत्त्व संख्यात सहस्र वर्ष होता है और स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त कम सोलह वर्ष होता है ॥ ४७३-४७५॥ विशेषार्थ - यद्यपि सात नोकषायों के क्षपण - कालमें सर्वत्र संज्वलनकषायोंका स्थितिसत्त्व संख्यात सहस्र वर्षप्रमाण ही था, किन्तु इस समय अर्थात् अश्वकर्णकरण करनेके प्रथम समयमें वह संख्यात सहस्र स्थितिकांडकोसे संख्यातगुणित हानिके द्वारा पर्याप्तरूप से घटकर उससे संख्यातगुणित हीन जानना चाहिए । उक्त कपाय - चतुष्कका स्थितिबन्ध पहले पूरे सोलह वर्ष प्रमाण था, वह अब अन्तर्मुहूर्त कम सोलह वर्ष होता है । इस समय शेष तीन घातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध और स्थितिसत्त्व संख्यात सहस्र वर्ष है । नाम, गोत्र और वेदनीयका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्प और स्थितिसत्त्व असंख्यात सहस्र वर्षप्रमाण होता है । इस प्रकार अश्वकर्णकरणकारकके स्थितिबन्ध और स्थितिसत्त्वका निर्णय करके अव उसीके अनुभागसत्त्वका निर्णय करते हैं चूर्णिसू० - अश्वकर्णकरणका आरम्भ करनेवाले जीवने अनुभागकांडकका घात करने के लिए जिस अनुभागसत्त्वको ग्रहण किया है वह मानसंज्वलनमे सबसे कम है, उससे क्रोधसंज्वलनमें विशेष अधिक है, उससे मायासंज्वलनमे विशेष अधिक है और उससे लोभसंज्वलनमें विशेष अधिक है । ( यहाँ सर्वत्र विशेप अधिकका प्रमाण अनन्त स्पर्धक है | ) अनुभागबन्ध-सम्वन्धी अल्पबहुत्व भी इसी प्रकार ही जानना चाहिए । किन्तु जो अनुभागकांडक ग्रहण किया है, उस अनुभागकांडक के स्पर्धक क्रोधमे सबसे कम हैं, इससे मान में विशेष अधिक स्पर्धक हैं, इससे मायामें विशेष अधिक स्पर्धक हैं और लोभमें विशेप अधिक स्पर्धक हैं । घात करनेके लिए ग्रहण किये गये स्पर्धकोसे अवशिष्ट अनुभाग-स्पर्धक लोभमे अल्प हैं, मायामें उससे अनन्तगुणित हैं, मानमें उससे अनन्तगुणित हैं और क्रोधमें उससे अणिनन्तगुत हैं । यह प्रथमसमयवर्ती अश्वकर्णकरणकारककी प्ररूपणा है ।। ४७६-४८९।।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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