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________________ गा० १६१] शंपक-अश्वकर्णकरणक्रिया-निरूपण ७८७ (१०८) ओवडणमुवट्टण किट्टीवज्जेसु होदि कम्मेसु । ओवट्टणा च णियमा किट्टीकरणम्हि बोद्धव्या ॥१६॥ ४७०. एदिस्से गाहाए अत्थविहासा कायया । ४७१. सत्तसु मूलगाहासु विहासिदासु तदोअस्सकण्णकरणस्स परूषणा । ४७२ अस्सकण्णकरणे त्ति वा आदोलकरणे त्ति ओवट्टण-उन्चट्टणकरणे त्ति वा तिणि णामाणि अस्सकण्णकरणस्स । ४७३. छसु कम्मेसु संछुद्ध सु से काले पडमसमयअवेदो । ताधे चेव पडमसमय अपवर्तन अर्थात् अपकर्षण और उद्वर्तन अर्थात् उत्कर्षण कृष्टि-वर्जित कर्मोंमें होता है । किन्तु अपवर्तना नियमसे कृष्टिकरणमें जानना चाहिए ॥१६१।। चूर्णिसू०-इस गाथाकी अर्थ-विभाषा करना चाहिए ॥४७०॥ विशेषार्थ- यह उपयुक्त गाथा उद्वर्तन और अपवर्तन इन दोनों करणोका विभाग प्रतिपादन करनेके लिए अवतरित हुई है। जिसका अभिप्राय यह है कि कृष्टिकरण-कालके पहले पहले तो दोनो ही करण होते हैं, किन्तु कृष्टिकरणके समय और उससे ऊपर सर्वत्र केवल अपवर्तनकरण ही होता है, उद्वर्तनकरण नहीं। यह व्यवस्था या विधान रूप उपदेश क्षपकश्रेणीकी अपेक्षा जानना चाहिए। क्योंकि उपशमश्रेणीमें कुछ विशेषता है और वह यह कि उतरनेवाले सूक्ष्मसाम्परायिकके प्रथम समयसे लेकर अनिवृत्तिकरणके प्रथम समय तक मोहनीय कर्मकी केवल अपवर्तना ही होती है । पुनः अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयसे लगाकर नीचे सर्वत्र अपवर्तना और उद्वर्तना ये दोनो ही होती हैं। इस प्रकार इस भाष्यगाथाका अर्थ सरल समझ कर चूर्णिकारने उसपर चूर्णिसूत्रों-द्वारा विभाषा न करके केवल यह सूचना कर दी कि मन्दबुद्धि शिष्योके लिए व्याख्यानाचार्य इस गाथासे सम्बद्ध अर्थ-विशेषकी व्याख्या करें। चूर्णिस०-इस प्रकार संक्रमण-प्रस्थापक-सम्बन्धी सातों मूलगाथाओंकी विभाषा कर दिये जानेपर तत्पश्चात् अब अश्वकर्णकरणकी प्ररूपणा करना चाहिए । अश्वकर्णकरण, अथवा आदोलकरण, अथवा अपवर्तनोद्वर्तनकरण, ये अश्वकर्णकरणके तीन नाम हैं ॥४७१-४७२॥ विशेपार्थ-अश्वकर्णकरण, आदोलकरण और अपवर्तनोद्वर्तनाकरण, ये तीनो एकार्थक नाम हैं। अश्व अर्थात् घोड़ेके कानके समान जो करण-परिणाम क्रमसे हीयमान होते हुए चले जाते हैं, उन परिणामोको अश्वकर्णकरण कहते हैं। आदोल नाम हिंडोलाका है । जिस प्रकार हिंडोलेका स्तम्भ और रस्सीका अन्तरालमे त्रिकोण आकार घोड़ेके कान सरीखा दिखता है, इसी प्रकार यहॉपर भी क्रोधादि संज्वलनकपायके अनुभागका सन्निवेश भी क्रमसे घटता हुआ दिखता है, इसलिए इसे आदोलकरण भी कहते हैं। क्रोधादि कषायोका अनुभाग हानि-वृद्धि रूपसे दिखाई देनेके कारण इसको अपवर्तनोद्वर्तनाकरण भी कहते हैं। चूर्णिस०-हास्यादि छह कर्मोंके संक्रान्त होनेपर तदनन्तर समयमे उपयुक्त जीव प्रथमसमयवर्ती अवेदी होता है। उस ही समयमें प्रथमसमयवर्ती अश्वकर्णकरण-कारक
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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