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________________ प्रस्तावनां ६७ 8 व्यंजन - अधिकार - व्यंजन नाम पर्यायवाची शब्दका है । इस अधिकारमें क्रोध, मान, माया और लोभ, इन चारों ही कपायोंके पर्यायवाचक शब्दोका निरूपण किया गया है । जैसे—क्रोधके क्रोध, रोष, अक्षमा, कलह, विवाद आदि । मानके मान, मद, दर्प, स्तम्भ, परिभव आदि । मायाके माया, निकृति, वचना, सातियोग और अनृजुता आदि । लोभके लोभ राग, निदान, प्रेयस्, मूर्च्छा आदि । कषायके इन विविध नामांक द्वारा कपाय - त्रिपयक अनेक ज्ञातव्य बातों पर नया प्रकाश पड़ता है । १० दर्शन मोहोपशमना - अधिकार - जिस कर्मके उदयसे जीवको अपने स्वरूपका दर्शन, साक्षात्कार और यथार्थ प्रतीति या श्रद्धान नहीं होने पाता, उसे दर्शन मोहकर्म कहते हैं । इस कर्मके परमाणुओं का एक अन्तर्मुहूर्त के लिए अन्तर रूप अभाव करने या उपशान्त रूप अवस्थाके करनेको उपशम कहते हैं । इस दर्शनमोहके उपशमनकी अवस्थामें जीवको अपने असली स्वरूपका एक अन्तमुहूर्त के लिए साक्षात्कार हो जाता है । उस समय वह जिस परम आनन्दका अनुभव करता है, वह वचनोंके अगोचर है । इस अधिकार मे इसी दर्शनमोहके उपशमन करनेवाले जीवके परिणाम कैसे होते हैं, उसके कौनसा योग, कौनसा उपयोग, कौनसी कपाय, कौनसी लेश्या और कौनसा वेद होता है, इन सर्व बातों का विवेचन करते हुए उन परिणाम-विशेपका विस्तारसे वर्णन किया गया है जिनके कि द्वारा यह जीव इस अलब्ध- पूर्व सम्यक्त्व-रत्नको प्राप्त करता है | दर्शनमोहके उपशमनको चारो ही गतियों के जीव कर सकते हैं, किन्तु उसे सज्ञी पचेन्द्रिय और पर्याप्तक नियमसे होना चाहिए | अन्त में इस प्रथमोपशमसम्यक्त्वी अर्थात् प्रथम वार उपशमसम्यग्दर्शनको प्राप्त करने वाले जीवके कुछ विशिष्ट कार्यों और अवस्थाओं का वर्णन किया गया है । ११. दर्शन मोहक्षपणा अधिकार - ऊपर दर्शनमोहकी जिस उपशम अवस्थाका वर्णन किया गया है, वह एक अन्तर्मुहूर्तके पश्चात् ही समाप्त हो जाती है और फिर वह जीव पहले जैसा ही आत्म-दर्शन से वचित हो जाता है । आत्म-साक्षात्कार सदा बना रहे, इसके लिए आवश्यक है कि उस दर्शनमोह कर्मका सदा के लिए क्षय ( खातमा) कर दिया जाय । और इसके लिए जिन खास बातों की आवश्यकता होती है, उन सबका विवेचन इस अधिकारमें किया गया है । इसमें बतलाया गया है कि दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भ कर्मभूमिका उत्पन्न हुआ मनुष्य ही कर सकता है । हॉ, उसकी पूर्णता चारों गतियों में की जा सकती है | दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भ करने वाले मनुष्य के कमसे कम तेजोलेश्या अवश्य होना चाहिए | दर्शनमोहकी क्षपणाका काल अन्तर्मुहूर्त है । इस क्षपण - क्रिया के समाप्त होने के पूर्व ही यदि उस मनुष्य की मृत्यु हो जाय, तो वह अपनी आयु बन्ध के अनुसार यथासंभव चारो ही गतियों में उत्पन्न हो सकता है । मनुष्य जिस भवमें दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भ करता है, उसके अतिरिक्त अधिकसे अधिक तीन भव और धारण करके संसारसे मुक्त हो जाता है, और सदा के लिए शाश्वत आनन्दको प्राप्त कर लेता है । १२ संयमासंयम लब्धि-अधिकार- - जब आत्माको अपने स्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है और वह मिथ्यात्वरूप कर्दम (कीचड़ ) ले निकल कर और निर्मल सरोवर में स्नान कर सरोवर के तट पर स्थित शिला तलपर अवस्थित हो जाता है, तब उसके आनन्दका पारावार नहीं रहता है और फिर वह इस बातका प्रयत्न करता है कि अब इस निंद्य, अलंध्य कर्दममें पुन: मेरा पतन न होवे | इस प्रकार से विचार कर सांसारिक विषय-वासनारूपी कीचड़ से जितने अशमं संभव होता है, उतने अंश में वह बचनेका प्रयत्न करता है, इसीको संयमासंयम-लब्धि कहते हैं ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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