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________________ कसायपाहुडसुत्त शास्त्रीय परिभाषाके अनुसार अप्रत्याख्यानावरण कपायके उदयके अभावसे देशसंयमको प्राप्त करने वाले जीवके जो विशुद्ध परिणाम होते हैं, उसे संयमासंयमलब्धि कहते हैं। इसके निमित्तसे जीव श्रावकके व्रतोंको धारण करने में समर्थ होता है । प्रकृत अधिकारमें संयमासंयमलब्धिके लिए आवश्यक सर्व कार्य-विशेषोका विस्तारसे वर्णन किया गया है। १३ संयमलब्धि-अधिकार-प्रत्याख्यानावरण कषायके अभाव होने पर आत्मामें संयमलब्धि प्रकट होती है, जिसके द्वारा आत्माकी प्रवृत्ति हिंसादि पॉचो पापोंसे दूर होकर अहिंसादि महाव्रतोंके धारण और पालनकी होती है। संयमके प्राप्त कर लेने पर भी कपायके उदयानुसार परिणामोंका कैसा उतार-चढ़ाव होता है, इस वातका प्रकृत अधिकारमें विस्तृत विवेचन करते हुए संयमलब्धि-स्थानोंके भेद बतला करके अन्तमे उनके अल्पबहुत्वका वर्णन किया गया है। १४ चारित्रमोहोपशोमना-अधिकार--इस अधिकार में चारित्रमोहनीय कर्मके उपशमका विधान करते हुए बतलाया गया है कि उपशम कितने प्रकारका होता है, किस किस कर्मका उपशम होता है, विवक्षित चारित्रमोह-प्रकृति की स्थिति के कितने भागका उपशम करता है, कितने भागका संक्रमण करता है और कितने भागकी उदीरणा करता है ? विवक्षित चारित्रमोहनीय प्रकृतिका उपशम कितने कालमें करता है, उपशम करने पर सक्रमण और उदीरणा कब करता है ? उपशामकके आठ करणोंमेसे कब किस करणकी व्युच्छत्ति होती है, इत्यादि प्रश्नोंका उद्भावन करके विस्तारके साथ उन सबका समाधान किया गया है। अन्त में बतलाया गया है कि उपशामक जीव एक वार वीतराग दशाको प्राप्त करनेके बाद भी किस कारणसे नीचेके गुणस्थानों में गिरता है और उस समय उसके कौन-कौनसे कार्य-विशेप किस क्रमसे प्रारम्भ होते हैं ? १५ चारित्रमोहक्षपणा-अधिकार-चारित्रमोहनीय कर्मकी प्रकृतियोंका क्षय किस किस क्रमसे होता है, किस किस प्रकतिके क्षय होने पर कहा पर कितना स्थितिबन्ध और स्थितिसत्त्व रहता है, इत्यादि कार्य-विशेषोंका इस अधिकार में बहुत विस्तारसे वर्णन किया गया है । अन्तमें बतलाया गया है कि जब तक यह जीव कषायोंका क्षय होजाने पर और वीतराग दशाक प्राप्त कर लेने पर भी छद्मस्थ पर्यायसे नहीं निकलता है, तब तक ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय कर्मका नियमसे वेदन करता है । तत्पश्चात् द्वितीय शुक्लध्यानसे इन तीनों घातिया कौका भी समूल नाश करके सर्वज्ञ ओर सर्वदर्शी होकर वे धर्मोपदेश करते हुए आर्यक्षेत्रमे विहार करते हैं। पश्चिमस्कन्ध अधिकार-सर्वज्ञ और सर्वदर्शी होजानेके पश्चात् भी सयोगिजिन. के चार अघातिया कर्म शेप रह जाते हैं, और उनके क्षय हुए विना सिद्ध अवस्था प्राप्त होती नहीं है, अतएव उनके क्षयका विधान चूर्णिकारने पश्चिमस्कन्धनामक अधिकारके द्वारा किया है । इसमें बतलाया गया है कि संयोगिजिन किस प्रकारसे केवलिसमुद्धावकरते हुए अघातिया कर्मोंका क्षय करके मुक्तिको प्राप्त करते हैं और सदाके लिए अजर, अमर वन करके अनन्त सुखके भागी बन जाते हैं। उपसंहार इस प्रकार प्रस्तुत ग्रन्थमे जीवोंको संसार-परिभ्रमण कराने वाले कपायोंके राग-द्वपास्मक स्वरूपका विविध प्रकारोंसे वर्णन करके उनसे विमुक्त होनेका मार्ग बतलाया गया है। .
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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