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________________ ७८० कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार उक्कस्सगो णिक्खेवो त्ति सव्वाणि हाणाणि अस्थि । ४१४. उकस्सओ पुण णिक्खेवो केत्तिओ ? ४१५. कसायाणं ताव उक्कड्डिज्जमाणियाए हिदीए उक्क स्सगं णिक्खेवं वत्तइस्सामो । ४१६. चत्तालीसं सागरोवमकोडाकोडीओ चदुहि वस्ससहस्सेहिं आवलियाए समयुत्तराए च ऊणिगाओ, एसो उक्कस्सगो णिक्खेवो। ४१७. जाओ आचाहाए उवरि द्विदीओ तासिमुक्कड्डिज्जमाणीणमइच्छावणा सव्वस्थ आवलिया । ४१८. जाओ आवाहाए हेट्ठा संतकम्मद्विदीओ तासिमुक्कड्डिजमाणीणमइच्छावणा किस्से वि द्विदीए आवलिया, किस्से वि द्विदीए समयुत्तरा, किस्से वि द्विदीए दुसमयुत्तरा, किस्से वि द्विदीए तिसमयुत्तरा । एवं णिरंतरमइच्छावणाट्ठानिक्षेपसे लेकर उत्कृष्ट निक्षेप तक सर्व स्थान निक्षेपरूप हैं ॥४०६-४१३॥ शंका-उत्कृष्ट निक्षेपका प्रमाण कितना है ? ॥४१४॥ समाधान-कषायोकी उत्कर्षण की जानेवाली स्थितिका उत्कृष्ट निक्षेप कहेगे । अर्थात् सर्व कर्मों के उत्कृष्ट निक्षेपका प्रमाण तो भिन्न भिन्न है, अतः हम उदाहरणके रूपमे कषायोके उत्कृष्ट निक्षेपका प्रमाण कहेंगे। एक समय अधिक आवली और चार हजार वर्षोंसे हीन चालीस कोडाकोड़ी सागरोपमप्रमाण यह उत्कृष्ट निक्षेप होता है ॥४१५.४१६॥ विशेपार्थ-निक्षेपका यह प्रमाण इस प्रकार संभव है कि कोई जीव कपायोकी चालीस कोडाकोड़ी सागर-प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिको बाँधकर और बन्धावली व्यतीत होनेके अनन्तरसमयमें ही उस प्रदेशाग्रको अपवर्तित कर नीचे निक्षिप्त करता है। इस प्रकारसे निक्षेप करनेवाला उदयावलीके बाहिर द्वितीय स्थितिमे निक्षिप्त प्रदेशाग्रको क्षपण करनेके लिए ग्रहण करता है । पुनः उस प्रदेशाग्रको तदनन्तर समयमे वन्ध होनेवाली चालीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण उत्कृष्ट स्थितिके ऊपर उत्कर्पण करता हुआ चार हजार वर्पप्रमाण उत्कृष्ट आवाधाकालका उल्लंघन करके इससे उपरिम निषेकस्थितियोमे ही निक्षिप्त करता है । इस प्रकार उत्कृष्ट आवाधाकालसे हीन चारित्रमोहनीय कर्मकी उत्कृष्ट स्थिति ही उत्कर्पणसम्बन्धी उत्कृष्ट निक्षेपका प्रमाण होता है। हॉ, इतनी बात विशेप है कि एक समय अधिक बन्धावली कालसे उक्त कर्मस्थितिको कम करना चाहिए, क्योंकि निरुद्ध समयप्रबद्धकी सत्त्वस्थितिका समयाधिक वधावली-प्रमित काल नीचे ही गल चुका है। इस प्रकार समयाधिक आवली और चार हजार वर्षोंसे हीन चालीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम उत्कृष्ट निक्षेपका प्रमाण जानना चाहिए। चूर्णिसू०-आवाधाकालसे उपरिवर्ती जो स्थितियाँ हैं, उत्कर्पण की जानेवाली उन स्थितियोंकी अतिस्थापना सर्वत्र आवलीप्रमाण है । आवाधाकालसे अधस्तनवर्ती जो सत्कर्मस्थितियाँ हैं, उत्कर्पण की जानेवाली उन स्थितियोकी अतिस्थापना किसी स्थितिकी तो एक आवली, किसी स्थितिकी एक समय-अधिक आवली, किसी स्थितिकी दो समय अधिक
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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