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________________ ७७९ गा० १५६] चारित्रमोहक्षपक-उत्कर्पणादिक्रिया-निरूपण ४०६. विहासा । ४०७. जहा । ४०८ हिदिसंतकम्मस्स अग्गद्विदीदो समयुत्तरहिदि बंधमाणो तं द्विदिसंतकम्म-अग्गहिदि ण उक्कड्डदि । ४०९. दुसमयुत्तरहिदि बंधमाणो वि ण उक्कड्डदि । ४१०. एवं गंतूण आवलियुत्तरहिदि बंधमाणो ण उक्कड दि । ४११.जइ संतकम्म-अग्गहिदीदो बज्झमाणिया द्विदी अदिरित्ता आवलियाए आवलियाए असंखेज्जदिभागेण च तदो सो संतकम्म-अग्गद्विदि सक्को उक्कड्डिदु। ४१२. तं पुण उक्कड्डियूण आवलियमधिच्छावेयूण आवलियाए असंखेज्जदिभागे णिक्खिवदि । ४१३. णिक्खेवो आवलियाए असंखेज्जदिभागमादि कादण समयुत्तराए बड्डीए णिरंतरं जाव उत्तर इस भाष्यगाथाके द्वारा दिया गया है। मूलगाथाकी प्रथम पृच्छा यह थी कि एक स्थितिविशेषको कितने स्थितिविशेषोमें बढ़ाता अथवा घटाता है ? इसका उत्तर इस भाष्यगाथाके प्रथम तीन चरणोमे दिया गया है कि एक स्थितिविशेषका उत्कर्पण या अपकर्षण करनेवाला नियमसे उस स्थितिको असंख्यात स्थितिविशेषोमें बढ़ाता अथवा घटाता है। मूलगाथाके चतुर्थ चरण-द्वारा अनुभाग-विषयक उत्कर्षण और अपकर्षणके सम्बन्धमे प्रश्न किया गया था, उसका उत्तर इस भाष्यगाथाके चतुर्थ चरण-द्वारा दिया गया है कि एक अनुभागविशेषको अनन्त अनुभाग-स्पर्धको बढ़ाता अथवा घटाता है । मूलगाथा-पठित 'च' और 'तु' शब्दके द्वारा जिन और नवीन पृच्छाओकी सूचना की गई थी, उनका उत्तर भी इस भाष्यगाथा-पठित 'च और तु' शब्दके द्वारा ही दिया गया है, अर्थात् एक स्थितिका उत्कर्षण-विषयक जघन्य निक्षेप आवलीके असंख्यातवे भागप्रमाण और उत्कृष्ट निक्षेप एक समय-अधिक आवलीसे ऊन और चार हजार वर्षोंसे हीन चालीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण है। अपकर्पण करनेमे जघन्य निक्षेपका प्रमाण एक समय कम आवलीके त्रिभागसे एक समय अधिक है। तथा उत्कृष्ट निक्षेप एक समय और दो आवली कम उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है । अनुभागसम्बन्धी जघन्य और उत्कृष्ट निक्षेप अनन्त स्पर्धक-प्रमाण है। चूर्णिस०-उक्त गाथाकी विभाषा इस प्रकार है-स्थिति-सत्कर्मकी अप्रस्थितिसे एक समय-अधिक स्थितिको वॉधता हुआ उस स्थिति-सत्कर्मकी अग्रस्थितिका उत्कर्पण नहीं करता है। दो समय-अधिक स्थितिको वॉधता हुआ भी स्थितिसत्त्वकी अग्रस्थितिका उत्कर्पण नहीं करता है। इस प्रकार तीन समय-अधिक, चार समय-अधिक आदिके क्रमसे जाकर एक आवली-अधिक स्थितिको वॉधता हुआ भी विवक्षित स्थितिसत्कर्मकी अग्रस्थितिका उत्कर्षण नहीं करता है। यदि स्थितिसत्त्वकी अग्रस्थितिसे वॉधी जानेवाली स्थिति आवलीसे और आवलीके असंख्यात भागसे अतिरिक्त ( अधिक ) हो तो वह उस स्थितिसत्त्वकी अग्रस्थितिका उत्कर्पण कर सकता है। क्योकि वह उस अग्रस्थितिका उत्कर्पण कर आवलीप्रमाण ( जघन्य ) अतिस्थापना करके आवलीके असंख्यातवे भागमे अर्थात् तत्प्रमाण जघन्य निक्षेपमें निक्षिप्त करता है। वह निक्षेप आवलीके असंख्यातवें भागको आदि करके एक समय अधिक वृद्धिसे निरन्तर उत्कृष्ट निक्षेप प्राप्त होनेतक बढ़ता जाता है। अर्थात् जघन्य
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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