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________________ ७७३ गा० १५१] चारित्रमोहक्षपक-उद्यादि-अल्पबहुत्व-निरूपण बंधो चउब्विहाए चड्डीए चउबिहाए हाणीए अवट्ठाणे च भजियव्यो । ३७५. एत्तो तदियाए गाहाए समुकित्तणा । (९७) गुणदो अणंतगुणहीणं वेदयदि णियमसा दु अणुभागे। अहिया च पदेसग्गे गुणेण गणणादियंतेण ॥१५०॥ ३७६. एदिस्से अत्थो पुव्यमणिदो। ३७७. एत्तोपंचमी मूलगाहा । ३७८. तिस्से समुक्त्तिणा । ३७९. जहा । (९८) किं अंतरं करेंतो वड्ढदि हायदि हिदी य अणुभागे। , णिरुवकमा च वही हाणी वा केचिरं कालं ॥१५१॥ करना चाहिए। अर्थात् प्रदेशोका संक्रमण वर्तमान कालमे कम होता है और तदुत्तर समयोमे असंख्यातगुणा होता जाता है। प्रदेशबन्ध चतुर्विध वृद्धि, चतुर्विध हानि और अवस्थानमें भजितव्य है अर्थात् वर्तमान समयके प्रदेशबन्धसे तदुत्तर समय-सम्बन्धी प्रदेशबन्ध कदाचित् चतुर्विध वृद्धिसे बढ़ भी सकता है, कदाचित् चतुर्विध हानिरूपसे घट भी सकता है और कदाचित् तदवस्थ भी रह सकता है। इसका कारण यह है कि आपकनेणी चढ़ते हुए भी योगो की वृद्धि, हानि और अवस्थान तीनो ही संभव हैं ॥३७१-३७४॥ चूर्णिसू०-अब तीसरी भाष्यगाथाकी समुत्कीर्तना करते हैं ॥३७५॥ अनुभागमें गुणश्रेणीकी अपेक्षा नियमसे अनन्तगुणा हीन वेदन करता है । किन्तु प्रदेशाग्रमें गणनातिकान्त गुणितरूप श्रेणीके द्वारा अधिक है ॥१५०।। . चूर्णिसू०-इस गाथाका अर्थ पहले कहा जा चुका है। अर्थात् यह गाथा पूर्वोक्त अर्थका ही उपसंहार करती है ॥३७६॥ . विशेषार्थ-इस तीसरी भाष्यगाथाके चतुर्थ चरणमे पठित 'गणणादियंतेण' पदका गणनातिकान्त अर्थके अतिरिक्त 'एयादीया गणना वीयादीया हवेज संखेज्जा' के नियमसे एक और विशिष्ट अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है-गणना अर्थात् एक, सवा, डेढ़, आदिसे अतिक्रान्त अर्थात् रहित ऐसे दो, तीन आदि संख्यात और संख्यातीत असंख्यातरूप गुणश्रेणीके द्वारा प्रदेशबन्ध उत्तरोत्तर समयोमे वृद्धि और हानि अवस्थासे परिणत होता है, किन्तु अनुभाग उत्तरोत्तर क्षणोंमें अनन्तगुणित हीन होता जाता है। चूर्णिसू०-अब इससे आगे पाँचवीं मूलगाथा अवतीर्ण होती है, उसकी समुत्कीर्तना इस प्रकार है ।।३७७-३७९।। अन्तरको करता हुआ वह कर्मोंकी स्थिति और अनुभागको क्या बढ़ाता है, अथवा घटाता है ? तथा स्थिति और अनुभागको बढ़ाते और घटाते हुए निरुपक्रम अर्थात् अन्तर-रहित वृद्धि अथवा हानि कितने काल तक होती है ? ॥१५१॥ विशेषार्थ-प्रकृत गाथा संक्रमण-सम्बन्धी गाथाओमें तो पॉचवीं है और अप
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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