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________________ चारित्रमोहक्षपक खन्धादि - अल्पय हुत्व-निरूपण गा० १४७ ] काले असंखेज्जगुणो । एवं सव्वत्थ । ३५८. एत्तो चउत्थी मूलगाहा । ३५९. तं जहा । (९४) बंधो व संकमो वा उदओ वा किं सगे सगे ट्ठाणे | से काले से काले अधिओ हीणो समो वा पि ॥ १४७॥ ७७१ असंख्यातगुणा होता है । इसी प्रकार उत्तरोत्तर समयो में सर्वत्र असंख्यातगुणा प्रदेशोदय जानना चाहिए || ३५४-३५७॥ चूर्णिसू० [0- अब इससे आगे चौथी मूलगाथाका अवतार किया जाता है । वह इस प्रकार है ।। ३५८-३५९॥ बन्ध, संक्रम और उदय स्वक स्वक स्थानपर तदनन्तर तदनन्तर कालकी अपेक्षा क्या अधिक हैं, हीन हैं, अथवा समान हैं ? || १४७ || विशेषार्थ - यह चौथी मूलगाथा अनुभाग और प्रदेशसम्बन्धी बन्ध, उदय और संक्रमण-विषयक स्वस्थान- अल्पबहुत्व की प्ररूपणा करनेके लिए अवतीर्ण हुई है । इसका स्पष्टी - करण इस प्रकार है - साम्प्रतिक या वर्तमान समय-सम्बन्धी बन्ध, उदय और संक्रमणसे तदनन्तर काल-सम्बन्धी बन्ध, उदय और संक्रमण अपने-अपने स्थानपर क्या अधिक होकर प्रवृत्त होते हैं, या हीन होकर प्रवृत्त होते हैं, अथवा समान होकर प्रवृत्त होते हैं ? इस प्रकारके प्रश्नो द्वारा यह गाथा बन्ध आदि पदोंका तदनन्तर काल के साथ भेद - आश्रय करके स्वस्थानअल्पबहुत्वका निरूपण करती है । यहॉपर पूर्व गाथासूत्रसे अनुभाग और प्रदेश पदकी, तथा 'गुणेण किं वा विसेसेण' इस पदकी अनुवृत्ति करना चाहिए | तदनुसार गाथाका अर्थ इस प्रकार करना चाहिए - अनुभाग-विषयक साम्प्रतिकबन्धसे तदनन्तर समयभावी बन्ध षड्गुणी वृद्धि और हानिकी अपेक्षा क्या अधिक है, हीन है या समान है ? साम्प्रतिक - उदयसे तदनन्तर समयसम्बन्धी उदय षड गुणी वृद्धि और हानिकी अपेक्षा क्या अधिक है, हीन है, या समान है ? तथा साम्प्रतिक संक्रमणसे तदनन्तरकाल-भावी संक्रमण पड्गुणी वृद्धि और हानिकी अपेक्षा सन्निकर्ष किये जानेपर क्या अधिक है, हीन है अथवा समान है ? इसी प्रकार प्रदेशोकी अपेक्षा भी साम्प्रतिक बन्ध, उदय और संक्रमणसे तदनन्तर-समय- सम्बन्धी बन्ध, उदय और संक्रमण अनन्तगुणी वृद्धि और हानिको छोड़कर शेष चतुःस्थान-पतित वृद्धि और हानिकी अपेक्षा अधिक हैं, हीन है या समान हैं ? प्रदेशों की अपेक्षा अनन्तगुणी वृद्धि और हानिको छोड़नेका यह अभिप्राय है कि विवक्षित समयसे तदनन्तर समय में कर्म - प्रदेशोकी अनन्तगुणी वृद्धि या हानि वन्ध, उदय या संक्रमणमें कहीं भी संभव नही है । इस मूल गाथा द्वारा उठाये गये प्रश्नोका उत्तर वक्ष्यमाण भाष्यगाथाओं द्वारा स्वयं ही ग्रन्थकारने दिया है । विवक्षित अर्थकी पृच्छाओंके द्वारा सूचना करना ही मूलगाथाका उद्देश्य होता है ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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