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________________ ७६६ फसाय पाहुड सुत्त [ १५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार ३१८. विहासा । ३१९. तं जहा । ३२०. जो जं पयडिं संछुहदि णियमा वज्झमाणीए द्विदीसु संछुहदि । ३२१. एसा पुरिमद्धस्स विहासा । ३२२. पच्छिमद्धस्स विहासा । ३२३. जहा । ३२४. जं बंधदि द्विदि तिस्से वा तत्तो हीणाए वा संछुहदि । ३२५. अवज्झमाणासु हिदीसु ण उक्कड्डिज्जदि। ३२६. समद्विदिगं तु संकामेज्ज । चूर्णिस०-अव इस भाष्यगाथाकी विभाषा करते हैं, वह इस प्रकार है-जो जीव जिस प्रकृतिको संक्रमित करता है, वह नियमसे वध्यमान स्थितिमें संक्रान्त करता है। यह गाथाके पूर्वार्धकी विभापा है। पश्चिमाकी विभापा इस प्रकार है-जिस स्थितिको वॉधता है, उसमे, अथवा उससे हीन स्थितिमे संक्रान्त करता है। किन्तु अवध्यमान स्थितियोंमें उत्कीर्ण कर संक्रान्त नहीं करता है। हॉ, समान स्थितिमें संक्रान्त करता है ॥३१८-३२६॥ विशेषार्थ-यह पांचवीं भाष्यगाथा बध्यमान प्रकृतियोमे संक्रमण किये जानेवाली बध्यमान या अवध्यमान प्रकृतियोका किस प्रकारसे संक्रमण होता है, इस अर्थविशेषके बतलानेके लिए अवतीर्ण हुई है। इसके अर्थका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-झपकश्रेणीमें अथवा उससे पूर्व संसारावस्थामें वर्तमान जो जीव जिस विवक्षित प्रकृतिके कर्म-प्रदेशोंको उत्कीर्ण कर जिस प्रकृतिमे संक्रमण करता है, उसे क्या विना किसी विशेषताके सर्वस्थितियोंमे संक्रमण करता है, अथवा उसमे कोई विशेषता है, इस प्रकारकी शंकाके समाधानके लिए ग्रन्थकारने गाथाका यह द्वितीय चरण कहा कि 'नियमसे वन्ध-सदृशमे संक्रान्त करता है।' यहॉपर 'वन्ध' इस पदसे साम्प्रतिक बन्धकी अग्रस्थितिका ग्रहण करना चाहिए, क्योकि स्थितिवन्धके प्रति उसकी ही प्रधानता है । अतएव यह अर्थ होता है कि इस समय बंधनेवाली प्रकृतिकी जो स्थिति हैं, उसमे उसके समान प्रमाणवाली विवक्षित संक्रम्यमाण प्रकृति के प्रदेशाग्रको उत्कीर्ण कर संक्रान्त करता है। यह कथन उत्कर्पणसंक्रमणकी प्रधानतासे किया गया है। 'वंधेण हीणदरगे' इस तीसरे चरणका अभिप्राय यह है कि बंधनेवाली अग्रस्थितिसे एक समय आदि फम अधस्तन वन्धस्थितियोमे भी-जो कि आवाधाकालसे बाहिर स्थित हैं-अधस्तन प्रदेशाग्रको स्वस्थान या परस्थानसे उत्कीर्ण कर संक्रमण करता है । किन्तु वर्तमानमे बंधनेवाली स्थितिसे उपरिम सत्त्व-स्थितियोंमें उत्कर्षणसंक्रमण नहीं होता है, यह 'अहिए वा संकमो णत्थि' इस चतुर्थ चरणका अर्थ है । यहॉपर पठित 'वा' शब्द समुञ्चयार्थक है, अतएव वन्धसे हीनतर किसी भी स्थितिविशेषमें उत्कर्षणसंक्रमण नहीं होता है, ऐसा अर्थ करना चाहिए, क्योंकि, आवाधाकालके भीतरकी स्थितियोंमें बद्ध प्रथम निपेकसे हीनतर स्थितियोमे उत्कर्षणसंक्रमणका सर्वथा अभाव माना गया है। अतएव आवाधाकालका उल्लंघन करके नवकवद्ध समयप्रवद्धके प्रथम निषेकको आदि लेकर नवकवद्ध समयप्रबद्धकी अन्तिम स्थिति तककी स्थितियोमें उत्कर्पणसंक्रमणका प्रतिपेध नहीं है, किन्तु इससे ऊपरकी स्थितियोर्मे और आवाधाकालकी भीतरी स्थितियोमें उत्कर्पणसंक्रमण नहीं होता है। परप्रकृतिरूप संक्रमण तो समस्थितिमें प्रवृत्त होता हुआ वध्यमान प्रकृतिके उदयावलीसे वाहिरी
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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