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________________ ७६७ गा० १४१] . . . . संक्रामक-विशेषफ्रिया निरूपण ७६७ (८८) संकामगपट्ठवगो माणकसायस्स वेदगो कोछ । संछुहदि अवेदेंतो माणकसाये कमो सेसे ॥१४१॥ ___३२७ विहासा । ३२८ जहा । ३२९. माणकसायस्स संकामगपट्टवगो माणं चेव वेदेंतो कोहस्स जे दो आवलियबंधा दुसमयूणा ते माणे संछुहदि । ३३०. विदियमूलगाहा त्ति विहासिदा समत्ता भवदि । स्थितिको आदि करके अंतिम स्थिति तक बंधकस्थितिसे उपरिम स्थितियोमे भी प्रतिषिद्ध नहीं है, यह अर्थ चतुर्थ चरणमे पठित 'वा' शब्दसे संगृहीत किया गया है। समस्थितिमे प्रवर्तमान पर-प्रकृतिरूप संक्रमण बंधकस्थितिसे अधस्तन-उपरितन समस्त स्थितियोमे किस प्रकार प्रवृत्त होता है, इसका उदाहरण इस प्रकार जानना चाहिए । जैसे सातावेदनीय आदि प्रकृतियोको बाँधते हुए किसी जीवके असातावेदनीय आदिका स्थितिसत्त्व अपने उत्कृष्ट स्थितिबन्धसे कुछ कम होता है। पुनः बध्यमान सातावेदनीयकी जो अन्तःकोड़ाकोड़ीसे लगाकर पन्द्रह कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण तक की उत्कृष्ट स्थिति है, उसके ऊपर असातावेदनीयकी स्थितिको संक्रमण करता हुआ बन्धस्थितियोमें भी संक्रमण करता है और बन्धसे उपरिम स्थितियोंमें भी समयाविरोधसे संक्रमण करता है अन्यथा एक आवलीसे कम तीस कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण उत्कृष्ट स्थितिका होना असंभव हो जायगा । इस प्रकार यह सामान्यसे संसारावस्थामें विवक्षित प्रकृतिके स्थितिबन्धके ऊपर इतर प्रकृतिके संक्रमणका दृष्टान्त दिया । इसी प्रकार क्षपकश्रेणीमें भी बध्यमान और अबध्यमान प्रकृतियोंको यथासंभव संक्रमण करता हुआ बध्यमान प्रकृतियोके प्रत्यग्रबन्धस्थितिसे अधस्तन और उपरितन स्थितियोमेंसे समस्थितिमे संक्रमण करता है, ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिए । मानकषायका वेदन करनेवाला वही संक्रमण-प्रस्थापक जीव क्रोधसंज्वलनको नहीं वेदन करते हुए ही उसे मानकषायमें संक्रान्त करता है । यही क्रम शेप कपायमें भी जानना चाहिए ॥१४१॥ चूर्णिसू०-इस भाष्यगाथाकी विभापा इस प्रकार है-मानकपायका संक्रमण-प्रस्थापक मानको ही वेदन करता हुआ क्रोधसंज्वलनके जो दो समय कम दो आवलीप्रमाण नवकबद्ध समयप्रवद्ध हैं, उन्हे मानसंज्वलनमें संक्रान्त करता है । इस प्रकार दूसरी मूलगाथा और उससे सम्बद्ध भाष्यगाथाओकी विभाषा समाप्त होती है ॥३२७-३३०॥ विशेषार्थ-अन्तर-द्विसमयकृत अवस्थामें वर्तमान वही संक्रमण-प्रस्थापक जीव यथाक्रमसे नव नोकषायोका संक्रमण कर और तत्पश्चात् अश्वकर्णकरण आदि क्रियाओको यथावसर ही करके संज्वलनक्रोधके चिरन्तन सत्त्वको सर्वसंक्रमणके द्वारा संक्रान्त करके जिस समय मानकपायका संक्रमण-प्रस्थापक हुआ, उस समय संज्वलनक्रोधके जो दो समय कम दो आवलीप्रमाण नवकवद्ध समयप्रबद्ध हैं, उन्हे संज्वलनमानमे संक्रमण करता हुआ
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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