SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 871
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ संक्रामक - विशेष क्रिया- निरूपण ૭૬૩ २९३. एदाणि कम्पाणि सव्वत्थ णियमा ण वेदेदि । २९४. एस अत्थो गा० १३५ ] J एदिस्से गाहाए । (८२) वेदे च वेदणीए सव्वावरणे तहा कसाए च । भयणिजो वेदंतो अभज्जगो सेसगो होदि ॥ १३५॥ २९५. विहासा । २९६. तं जहा । २९७. वेदे च ताव तिन्हं वेदाणमण्णदरं वेदेज्ज । २९८ वेदणीये सादं वा असादं वा । २९९. सव्वावरणे आभिणिबोहियणाणावरणादीणमणुभागं सव्वधादिं वा देसघादि वा । ३००. कसाये उन्हं कसायाणमण्णदरं । ३०१. एवं भजिदव्यो वेदे च वेदणीये सव्वावरणे कसाए 'णिमा' पद दिया गया है । यदि कहा जाय कि स्त्यानगृद्धिन्त्रिकका संक्रमणप्रस्थापन - अवस्थाके पूर्व ही सत्त्व-विच्छेद हो चुका है, तब फिर यहॉपर उनके उदय व्युच्छेदका निर्देश सार्थक नहीं माना जा सकता है ? दूसरे, गाथामें स्त्यानगृद्धि आदि तीनों पदोमेंसे किसी एकका भी निर्देश नहीं है, ऐसी दशामें 'णिद्दा' पदसे निद्राका, तथा 'पयला' पदसे प्रचलाका ही ग्रहण करना चाहिए ? और संक्रमण - प्रस्थापक इन दोनो ही प्रकृतियोका अवेदक रहता है, ऐसा ही गाथासूत्रका अर्थ करना चाहिए । अन्यथा बारहवें गुणस्थानके द्विचरम समय में निद्रा और प्रचलाका उदय व्युच्छेद कहना शक्य नहीं है ? तो इसका उत्तर यह है कि इस संक्रमण - प्रस्थापकदशाके पूर्व और उत्तरकालीन अवस्थामे अव्यक्तस्वरूपसे यद्यपि निद्रा और प्रचलाका उदय विद्यमान रहता है तथापि इस मध्यवर्ती अवस्थामें ध्यानके उपयोगविशेषसे उनकी शक्ति प्रतिहत होजानेके कारण उनका उद्याभाव मानने में कोई विरोध नहीं है । अथवा क्षपक श्रेणी में सर्वत्र निद्रा और प्रचलाका उदय नहीं होता है, ऐसा ही गाथासूत्रका अर्थ ग्रहण करना चाहिए, क्योकि ध्यानकी उपयुक्त दशामें निद्रा और प्रचलाका उदय संभव नहीं है । चूर्णिसू० - इन गाथा - पठित कर्मों को संक्रमण - प्रस्थापक जीव अपनी सर्व अवस्थाओंमें नियमसे वेदन नही करता है । यह इस भाष्यगाथाका अर्थ है ॥२९३-२९४॥ अव दूसरी मूलगाथा के द्वितीय अर्थ - निबद्ध दूसरी भाष्यगाथाका अवतार करते हैंवह संक्रमण प्रस्थापक वेदोंको, वेदनीय कर्मको, सर्वघातिया प्रकृतियोंको, तथा कषायोंको वेदन करता हुआ भजनीय है । उक्त कर्म - प्रकृतियों के अतिरिक्त शेष प्रकृतियोंका वेदन करता हुआ अभजनीय है || १३५ ॥ चूर्णिसू०- - इस गाथाकी विभाषा करते हैं । वह इस प्रकार है - वह संक्रमण प्रस्थापक तीनों वेदोंमेंसे किसी एक वेदका वेदन करता है, अर्थात् जिस वेदके उदयसे श्रेणी चढ़ता है, उस वेदका ही वेदन करता है । सातावेदनीय और असातावेदनीय इन दोनों में से किसी एकका वेदन करता है | आभिनिवोधिकज्ञानावरणीय आदि सर्व आवरणीय कर्मों के सर्वघाती या देशघाती अनुभागका वेदन करता है और चारो कपायोमेसे किसी एक कपायका अनुभव करता है । इस प्रकार वेद, वेदनीय, सर्व आवरण कर्म और कपायोकी अपेक्षा वह संकमण
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy