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________________ ७६२ • कसाय पाहुड सुत्त - [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार २९२. एत्तिगे मूलगाहाए पढमो अत्थो समत्तो भवदि । (८१) णिदा य णीचगोदं पचला णियमा अगि त्ति णामं च । छच्चेय णोकसाया अंसेसु अवेदगो होदि ॥१३४॥ चूर्णिसू०--इस प्रकार तीन भाष्यगाथाओंके द्वारा इतने अर्थक व्याख्यान करनेपर मूलगाथाका प्रथम अर्थ समाप्त होता है ॥२९२॥ मूलगाथाके द्वितीय अर्थमें प्रतिबद्ध दोनो भाष्यगाथाओंकी यथाक्रमसे व्याख्या करनेके लिए एक साथ समुत्कीर्तना और विभापा करते हैं निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, नीचगोत्र, अयश कीर्ति और छह नोकपाय, इतने कर्मोका तो संक्रमण-प्रस्थापक नियमसे प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेशरूप सर्व अंशोंमें अवेदक रहता है ॥१३४॥ विशेषार्थ-यह मूलगाथाके 'के च वेदयदि अंसे' अर्थात् 'कितने कर्माशोंका वेदन करता हैं, इस द्वितीय अर्थका व्याख्यान करनेवाली प्रथम भाष्यगाथा है। वह संक्रमणप्रस्थापक संयत गाथामें कही गई उक्त प्रकृतियोका वेदन नहीं करता है, अर्थात् उसके उक्त प्रकृतियोंका उदय नहीं है। गाथामे यद्यपि 'निद्रा' ऐसा सामान्य ही पद है, पर उससे 'निद्रानिद्रा' का ग्रहण करना चाहिए; क्योकि नामके एक देशके निर्देशसे भी पूरे नामका बोध हो जाता है । इसी प्रकार 'प्रचला' इस पदसे प्रचलाप्रचलाका ग्रहण करना चाहिए । इन दोनों पदोंके वीचमें पठित 'च' शब्द अनुक्त-समुच्चयार्थक है, अतः उससे स्त्यानगृद्धिका ग्रहण किया गया है । 'अगि' यह संकेत 'अजसगित्ति' अर्थात् अयशःकार्तिका बोधक है । यहॉपर इस पदको उपलक्षण मानकर अवेद्यमान सभी प्रशस्त-अप्रशस्त प्रकृतियोका ग्रहण करना चाहिए, क्योकि मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति आदि तीस प्रकृतियोको छोड़कर शेषका यहां पर उदय नहीं पाया जाता। यहां यह शंका की जा सकती है कि जव गाथामे 'निद्रा और प्रचला' ये दो नाम ही स्पष्टरूपसे कहे गये हैं, तब निद्रासे निद्रानिद्राका और प्रचलासे प्रचलाप्रचलाका क्यो ग्रहण किया जाय ? इसी प्रकार स्त्यानगृद्धि' यह नाम गाथामें कही दृष्टिगोचर भी नहीं होता, फिर क्यो 'च' पदसे उसका ग्रहण किया जाय ? इसका समाधान यह है, कि निद्रा और प्रचलाका उदय वारहवे गुणस्थानके द्विचरम समय तक पाया जाता है, अतः वैसा माननेमे आगमसे विरोध आता है । दूसरे, गाथामे इनके साथ जिन नीचगोत्र आदि प्रकृतियोंका उल्लेख किया गया है, उनमें से अयशः. कीर्तिका चौथे गुणस्थानमें, नीचगोत्रका पांचवें गुणस्थानमें, तथा निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धिका छठे गुणस्थानमें तथा हास्यादि छहका आठवें गुणस्थानमें ही उदयव्युच्छेद हो जाता है, जिससे उनका यहाँ उदय संभव ही नहीं है । अतः वही उक्त अर्थ आगम तथा युक्तिसे सुसंगत जानना चाहिए। इसी अभिप्रायको स्पष्ट करनेके लिए गाथामें
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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