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________________ ७६१ गा० १३३ ] संक्रामक-वन्धावन्धप्रकृति-निरूपण २८४. एदाणि णियमा ण बंधइ । (८०) सव्वावरणीयाणं जेसिं ओवट्टणा दुणिदाए । पयलायुगस्स अ तहा अबंधगो बंधगो सेसे ॥१३३॥ २८५. जेसिमोवट्टणा त्ति का सण्णा ? २८६. जेसिं कम्माणं देसघादिफद्दयाणि अस्थि तेसिं कम्माणमोवट्टणा अत्थि त्ति सण्णा । २८७. एदीए सण्णाए सव्वावरणीयाणं जेसिमोवट्टणा दु त्ति एदस्स पदस्स विहासा । २८८. तं जहा । २८९. जेसिं कम्माणं देसघादिफद्दयाणि अत्थि, ताणि कम्माणि सव्यघादीणि ण बंधदिः देसघादीणि बंधदि । २९०. तं जहा । २९१. णाणावरणं चउन्विहं, दंसणावरणं तिविहं अंतराइयं पंचविहं, एदाणि कम्माणि देसवादीणि बंधदि । चूर्णिस०-इतने कर्मों को नियमसे नहीं बांधता है ॥२८४॥ विशेषार्थ-द्विसमयकृत अन्तरवाला संक्रमण-प्रस्थापक जीव पुरुषवेदको छोड़कर शेप आठ नोकषायोका नियमसे बन्ध नहीं करता है । इसी प्रकार असातावेदनीय, नीचगोत्र, अयशःकीर्ति और शरीर-नामकर्मको भी नहीं बांधता है। यहाँ गाथा-पठित 'अयशःकीर्ति' से सभी अशुभ नामकर्मकी प्रकृतियोका ग्रहण करना चाहिए। इसी प्रकार 'शरीर-नामकर्मसे वैक्रियिकशरीरादि सभी शरीरनामकर्म और उनसे सम्बन्ध रखनेवाले आंगोपांग नामकर्म आदि तथा यशःकीर्तिके सिवाय सभी शुभनाम-प्रकृतियोका भी ग्रहण करना चाहिए । अर्थात् द्विसमयकृत-अन्तरवर्ती संक्रामक एकमात्र यशःकीर्ति नामकर्मको छोड़कर शेप समस्त शुभाशुभ नामकर्मकी प्रकृतियोको नहीं बांधता है। इनके अतिरिक्त जिनकी अपवर्तना होती है, ऐसे सर्वघातिया कर्मोंका और निद्रा, प्रचला तथा आयुकर्मका भी वह वन्ध नहीं करता है, इनके सिवाय जो प्रकृतियाँ शेष रहती है, उनका बन्ध करता है। यह वात आगेकी गाथामे बतलाई गई है। जिन सर्वावरणीय अर्थात् सर्वघातिया कर्मोकी अपवर्तना होती है, उनका और निद्रा, प्रचला तथा आयुकर्मका भी अबन्धक रहता है। इनके अतिरिक्त शेष कर्मोंका वन्ध करता है ॥१३३।। ___ शंका-'जिनकी अपवर्तना होती है। इस वाक्य-द्वारा प्रगट की गई यह अपवर्तना संज्ञा किसकी है ? ॥२८५॥ समाधान-जिन कर्मों के देशघाती स्पर्धक होते हैं, उन कर्मो की 'अपवर्तना' यह संज्ञा है ॥२८६॥ चूर्णिसू०-इस संज्ञाके द्वारा जिन सर्वावरणीय अर्थात् सर्वघातिया ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय कर्मोकी अपवर्तना होती है, इस पदकी विभापा की गई । वह इस प्रकार हैजिन कर्मोंके देशघाती स्पर्धक होते हैं, उन सर्वघातिया कर्मो को नहीं वॉधता है, किन्तु देशघातिया कर्मो को बॉधता है । जैसे-मतिज्ञानावरणादि चार ज्ञानावरण, चक्षुदर्शनावरणादि चार दर्शनावरण और पॉच प्रकारका अन्तराय, इन देशघातिया कर्मो को वॉधता है।।२८७-२९१॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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