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________________ गा० १२६] संक्रामक प्रस्थापक-विशेषक्रिया-निरूपण ७५७ २५८. एदिस्से पंच भासगाहाओ' । २५९. तं जहा । २६०. भासगाहाओ परूविज्जंतीओ चेव भणिदं होंति गंथगउरवपरिहरणटुं । २६१. मोहणीयस्स अंतरदुसमयकदे संकामगपट्ठवगो होदि । एत्थ सुत्तं । (७२) संकामगपट्रवगस्स मोहणीयस्स दो पुण ट्रिदीओ। किंचूणियं मुहत्तं णियमा से अंतरं होई ॥१२५॥ २६२.किंचूणगं मुहुत्तं ति अंतोमुहुत्तं ति णादव्वं । २६३. अंतरदुसमयकदादो आवलियं समयूणमधिच्छियूण इमा गाहा । २६४. यथा। (७३) झीणहिदिकम्मसे जे वेदयदे दु दोसु वि ट्ठिदीसु । जे चावि ण वेदयदे विदियाए ते दु बोद्धव्वा ॥१२६॥ चूर्णिसू०-इस मूलगाथाके अर्थको प्रकट करनेवाली पॉच भाष्यगाथाएँ हैं । वे इस प्रकार हैं-ग्रन्थ-गौरवके परिहार करनेके लिए पृथक्-पृथक् अर्थ प्ररूपण की गई भाष्यगाथाएँ ही मूलगाथाके अर्थका व्याख्यान करती हैं ॥२५८-२६०॥ विशेषार्थ-प्रश्नरूप अर्थका उत्तररूप अर्थ-व्याख्यान करनेवाली गाथाओको भाष्यगाथा कहते हैं । विभाषाके नियमसे पहले गाथाओकी समुत्कीर्तना करना चाहिए। पीछे उनके पदोंका आश्रय लेकर अर्थकी प्ररूपणा करना चाहिए। परन्तु ऐसा करनेसे ग्रन्थका विस्तार हो जाता है. अतः चर्णिकार उस नियमका उल्लंघन कर समुत्कीर्तना और अर्थविभाषाको एक साथ कहेगे, ऐसा अभिप्राय जानना चाहिए। चूर्णिसू०-अन्तरकरणको समाप्त करके द्वितीय समयमें वर्तमान जीव मोहनीयका संक्रमण-प्रस्थापक होता है । इस विषयमें यह गाथासूत्र है ॥२६१॥ ___संक्रमण-प्रस्थापकके मोहनीय कर्मकी दो स्थितियाँ होती हैं-एक प्रथमस्थिति और दूसरी द्वितीयस्थिति । इन दोनों स्थितियोंका प्रमाण कुछ कम मुहूर्त है । तत्पश्चात् नियमसे अन्तर होता है ॥१२५॥ चूर्णिसू०- 'कुछ कम मुहूर्त' इसका अर्थ अन्तर्मुहूर्त जानना चाहिए ॥२६२॥ चूर्णिसू०-द्विसमयकृत अन्तरसे लेकर एक समय कम आवली प्रमाण काल तक ठहर कर, अर्थात् अवेद्यमान ग्यारह प्रकृतियोंकी समयोन आवलीमात्र प्रथमस्थितिका पालन कर और वेद्यमान अन्यतर वेद और किसी एक संज्वलन प्रकृतिको अन्तर्मुहूर्तप्रमाण प्रथमस्थितिको करके अवस्थित जीवके उस अवस्थाविशेषमे यह दूसरी वक्ष्यमाण भाष्यगाथा जानने योग्य है । वह इस प्रकार है ॥२६३-२६४॥ . जो उदय या अनुदयरूप कर्म-प्रकृतियाँ परिक्षीण स्थितिवाली हैं, उन्हें उपयुक्त जीव दोनों ही स्थितियोंमें वेदन करता है। किन्तु वह जिन कर्माशोंको वेदन नहीं करता है, उन्हें तो द्वितीयस्थितिमें ही जानना चाहिए ॥१२६॥ १ भासगाहाओ त्ति वा, वक्खाणगाहाओ त्ति वा, विवरणगाहाओ त्ति वा एयट्ठो । जयध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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