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________________ गा० १२३ ] चारित्रमोहक्षपक-विशेषक्रिया-निरूपण ७५१ द्विदिसंतकम्मं विसेसाहियं । १९३.एदेण कमेण संखेज्जाणि द्विदिखंडयसहस्साणि गदाणि। १९४. तदो असंखेज्जाणं समयपबद्धाणमुदीरणा । १९५. तदो संखेज्जेसु हिदिखंडयसहस्सेसु गदेसु अट्टण्हं कसायाणं संकामगो। १९६. तदो अट्ठकसाया द्विदिखंडयपुधत्तेण संकामिज्जति । १९७. अट्ठण्हं कसायाणमपच्छिमट्ठिदिखंडए उकिण्णे तेसिं संतकम्ममावलियपविट्ठ सेसं । १९८ तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण णिहाणिद्दा-पयलापयला-थीणगिद्धीणं णिरयगदि-तिरिक्खगदिपाओग्गणामाणं संतकम्मस्स संकामगो । १९९. तदो द्विदिखंड यपुधत्तेण अपच्छिमे द्विदिखंडए उक्किण्णे एदेसिं सोलसण्हं कम्माणं द्विदिसंतकम्ममावलियम्भंतरं सेसं। २००. तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण मणपज्जवणाणावरणीय-दाणंतराइयाणं च अणुभागो बंधेण देसघादी जादो । २०१. तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण ओहिणाणावरणीयओहिदसणावरणीय-लाहंतराइयाणमणुभागो वंधेण देसघादी जादो । २०२. तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण सुदणाणावरणीय-अचक्खदंसणावरणीय-भोगंतराइयाणमणुभागो बंधेण देसघादी जादो । २०३. तदो द्विदिखंड यपुधत्तेण चक्खुदंसणावरणीय-अणुभागो वंधेण देसघादी जादो । २०४. तदो द्विदिखंड यपुधत्तेण आभिणिवोहियणाणावरणीय-परिभोसंख्यात सहस्र स्थितिकांडक व्यतीत होते है । तत्पश्चात् असंख्यात समयप्रबद्धोकी उदीरणा होती है ॥१८५-१९४॥ चूर्णिसू०-तत्पश्चात् संख्यात सहस्र स्थितिकांडकोके व्यतीत होनेपर आठ मध्यम कषायोका संक्रामक अर्थात् क्षपणाका प्रारम्भक होता है। तत्पश्चात् स्थितिकांडकपृथक्त्वसे आठ कषाय संक्रान्त की जाती हैं। आठ कषायोके अन्तिम स्थितिकांडकके उत्कीर्ण होनेपर उनका स्थितिसत्त्व आवली-प्रविष्ट शेष अर्थात् उदयावलीप्रमाण रहता है । पुनः स्थितिकांडकपृथक्त्वके पश्चात् निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धि तथा नरकगति और तिर्यंचगतिके प्रायोग्य नामकर्मकी तेरह प्रकृतियोके स्थितिसत्त्वका संक्रामक होता है । ( वे तेरह प्रकृतियाँ ये हैं-नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रियजाति, आताप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण । ) पुनः स्थितिकांडकपृथक्त्वसे अपश्चिम स्थितिकांडकके उत्कीर्ण होनेपर इन उपयुक्त सोलह कर्मो का स्थितिसत्त्व उदयावली-प्रविष्ट शेष रहता है ॥१९५-१९९॥ ___ चूर्णिसू०-तत्पश्चात् स्थितिकांडकपृथक्त्वके द्वारा मनःपर्ययज्ञानावरणीय और दानान्तरायकर्मका अनुभाग बन्धकी अपेक्षा देशघाती हो जाता है । पुनः स्थितिकांडकपृथक्त्वके द्वारा अवधिज्ञानावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और लाभान्तराय फर्मका अनुभाग बंधकी अपेक्षा देशघाती हो जाता है । पुनः स्थितिकांडकपृथक्त्वके द्वारा श्रुतज्ञानावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय और भोगान्तराय कर्मका अनुभाग बन्धकी अपेक्षा देशघाती हो जाता है । पुनः स्थितिकांडकपृथक्त्वके द्वारा चक्षुदर्शनावरणीय कर्मका अनुभाग बन्धकी अपेक्षा देशघाती हो
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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