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________________ ७५० कसाय पाहुड सुस्त [१५ चारित्रमोह क्षपणाधिकार संतकम्मं तुल्लमसंखेज्जगुणं । १७३. मोहणीयस्स हिदिसंतकम्ममसंखेज्जगुणं । १७४. तदो हिदिखंडयपुधत्तेण मोहणीयस्स वि पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो डिदिसंतकम्म जादं । १७५. ताधे अप्पावहुअं। जधा-णामा-गोदाणं द्विदिसंतकम्मं थोवं । १७६. चदुण्हं कम्माणं ट्ठिदिसंतकम्म तुल्लमसंखेज्जगुणं । १७७ मोहणीयस्स हिदिसंतकम्म असंखेज्जगुणं । १७८. एदेण कमेण संखेज्जाणि द्विदिखंडयसहस्साणि गदाणि । १७९. तदो णामा-गोदाणं द्विदिसंतकम्मं थोवं । १८०. मोहणीयस्स द्विदिसंतकम्ममसंखेज्जगुणं । १८१. चउण्हं कम्माण डिदिसंतकम्मं तुल्लमसंखेज्जगुणं । १८२. तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण गदे एकसराहेण मोहणीयस्स हिदिसंतकम्मं थोवं । १८३. णामा-गोदाणं विदिसंतकम्ममसंखेज्जगुणं । १८४. चउण्हं कम्माणं द्विदिसंतकम्मं तुल्लमसंखेज्जगुणं । १८५. तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण मोहणीयस्स द्विदिसंतकम्मं थोवं । १८६. णामागोदाणं द्विदिसंतकम्मं असंखेज्जगुणं । १८७. तिण्हं धादिकम्माणं द्विदिसंतकम्ममसंखेज्जगुणं । १८८. वेदणीयस्स हिदिसंतकम्ममसंखेज्जगुणं । १८९. तदो द्विदिखंडयपुधत्तेण मोहणीयस्स हिदिसंतकम्म थोत्रं । १९०. तिण्हं घादिकम्माणं हिदिसंतकम्ममसंखेज्जगुणं । १९१. णामा-गोदाणं द्विदिसंतकम्ममसंखेज्जगुणं । १९२. वेदणीयस्स मोहनीयका स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा है । पुनः स्थितिकांडकपृथक्त्वके पश्चात् मोहनीयका भी स्थितिसत्त्व पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमाण हो जाता है। उस समय अल्पवहुत्व इस प्रकार है-नाम और गोत्रकर्मका स्थितिसत्त्व सबसे कम है । चार कर्मों का स्थितिसत्त्व परस्पर तुल्य और असंख्यातगुणा है । मोहनीयका स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा है ॥१६५-१७७॥ चूर्णिस०-इस क्रमसे संख्यातसहस्र स्थितिकांडक व्यतीत होते हैं। तब नाम और गोत्रका स्थितिसत्त्व सबसे कम होता है। मोहनीयका स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा होता है। चार कर्मों का स्थितिसत्त्व परस्पर तुल्य और असंख्यातगुणा होता है। तत्पश्चात् स्थितिकांडक पृथक्त्वके व्यतीत होनेपर एक साथ मोहनीयका स्थितिसत्त्व सबसे कम हो जाता है । नाम और गोत्रका स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा होता है। चार कर्मों का स्थितिसत्त्व परस्पर तुल्य और असंख्यातगुणा होता है ।। १७८-१८४॥ चूर्णिस०-तदनन्तर स्थितिकांडक-पृथक्त्वके पश्चात् मोहनीयका स्थितिसत्त्व सबसे कम हो जाता है । नाम और गोत्रका स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा होता है । तीन घातिया कर्मो का स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा होता है। वेदनीयका स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा होता है । पुनः स्थितिकांडकपृथक्त्वके पश्चात् मोहनीयका स्थितिसत्त्व सबसे कम होता है। तीन घातिया कर्मों का स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा होता है। नाम और गोत्रकर्मका स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा होता है। वेदनीयका स्थितिसत्त्व विशेष अधिक होता है। इस क्रमसे
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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