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________________ ० १२३ ] चारित्रमोहक्षपणा प्रस्थापक स्वरूप-निरूपण ७३९ १२. अण्णदरो कसायो । १३. किं वडमाणो हायमाणो ? णियमा हायमाणो । १४. उवजोगेति विहासा । १५. एक्को उवएसो णियमा सुदोवजुत्तो होण खवगसेटिं चदिति । १६. एक्को उवदेसो सुदेण वा, मदीए वा, चक्खुदंसणेण वा, अचक्खुदंसणेण वा । १७. लेस्सा त्तिविहासा । १८. णियमा सुक्कलेस्सा । १९. णियमा वड्ढमाणलेस्सा | २०. वेदो व को भवेति विहासा । २१. अण्णदरो वेदो । २२. काणि वा पुचद्वाणि च विहासा । २३. एत्थ पय डिसंतकम्मं हिदिसंतकम्ममणुभागसंतकम्मं पदेस संतकम्मं च मग्गियन्वं । २४. के वा असे बिंदि विहासा | २५. एत्थ पयडिबंधो ठिदिबंधो अणुभागबंधो पदेसबंधो च मग्गियव्वो । २६. कदि आवलियं पविसंति त्तिविहासा । २७. मूलपयडीओ सव्वाओ पविसंति । उत्तरपयडीओ वि जाओ अस्थि, ताओ पविसंति । २८. कदिहं वा पवेसगोत्ति विहासा । २९. आउग वेदणीयवजाणं वेदिज्जमाणाणं क्रम्माणं पवेसगो । ३०. के अंसे झीयदे पुव्वं बंधेण उदएण वा त्तिविहासा । ३१. थी गिद्ध वर्धमान कषाय होती है, अथवा हीयमान ? नियमसे हीयमान कषाय होती है । 'उपयोग ' इस पदकी विभाषा की जाती है - इस विषयमें एक उपदेश तो यह है कि नियमसे श्रुतज्ञानरूप उपयोगसे उपयुक्त होकर ही क्षपकश्रेणीपर चढ़ता है। एक दूसरा उपदेश यह है कि श्रुतज्ञानसे, अथवा मतिज्ञानसे, चक्षुदर्शनसे अथवा अचक्षुदर्शन से उपयुक्त होकर क्षपकश्रेणी - पर चढ़ता है । 'लेश्या' इस पदकी विभाषा की जाती है - चारित्रमोहकी क्षपणा प्रारम्भ करनेवालेके नियमसे शुकुलेश्या होती है । वह भी वर्धमान लेश्या होती है । 'कौन-सा वेद होता है' इस पदकी विभापा की जाती है - क्षपकश्रेणीपर चढ़नेवाले जीवके तीनो वेदोमेसे कोई एक वेद होता है ॥४-२१॥ चूर्णिसू० - ' कौन कौन कर्म पूर्वबद्ध हैं' इस दूसरी प्रस्थापन - गाथा के प्रथम पदकी विभाषा की जाती है - यहाँपर अर्थात् क्षपणा प्रारम्भ करनेवाले के प्रकृतिसत्त्व, स्थितिसत्त्व, अनुभागसत्त्व और प्रदेशसत्त्वका अनुमार्गण करना चाहिए । 'कौन कौन कर्माशोको बाँध है' दूसरी गाथाके इस दूसरे पदकी विभाषा की जाती है - यहॉपर प्रकृतिवन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध और प्रदेशबन्ध का अनुमार्गण करना चाहिए । 'कितनी प्रकृतियाँ उदद्यावली में प्रवेश करती हैं' दूसरी गाथाके इस तीसरे पदकी विभापा की जाती है-क्षपणा प्रारम्भ करनेवाले जीवके उदद्यावलीमे मूलप्रकृतियाँ तो सभी प्रवेश करती हैं । उत्तरप्रकृतियाँ भी जो सत्ता में विद्यमान हैं, वे प्रवेश करती हैं । 'कितनी प्रकृतियोका उदद्यावलीमे प्रवेश करता है' इस चौथे पदकी विभाषा की जाती है - आयु और वेदनीय कर्मको छोड़कर वेदन किये जानेवाले सर्व कर्मोंको प्रवेश करता है ॥२२- २९॥ चूर्णिसू० - 'कौन कौन कर्माश बन्ध अथवा उदयकी अपेक्षा पहले निर्जीर्ण होते हैं' तीसरी गाथा के इस पूर्वार्धकी विभाषा की जाती है - स्त्यानगृद्धित्रिक, मिध्यात्व, बारह कपाय,
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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