SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 845
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ७३७ गा० १२३] पतमान-उपशामक-विशेषक्रिया-निरूपण ६९८. अपुरकरणस्स पढमसमए द्विदिवंधो संखेज्जगुणो। ६९९. पडिवदमाणयस्स अपुव्वकरणस्स चरिमसमए हिदिबंधो संखेज्जगुणो।। ७००. पडिवदमाणयस्स अपुचकरणस्स चरिमसमए ठिदिसंतकम्मं संखेज्जगुणं । ७०१. पडिवदमाणयस्स अपुचकरणस्स पडमसमये ठिदिसंतकम्मं विसेसाहियं । ७०२. पडिवदमाणयस्स अणियट्टिस्स चरिमसमये ठिदिसंतकम्मं विसेसाहियं । ७०३. उवसामगस्स अणियट्टिस्स परमसमये ठिदिसंतकम्मं संखेज्जगुणं । ७०४. उवसामगस्स अपुव्वकरणस्स चरिमसमए ठिदिसंतकम्मं विसेसाहियं । ७०५ उवसामगस्स अपुन्छकरणस्स परमसमए ठिदिसंतकर्म संखेज्जगुणं। ७०६. एत्तो पडिवदमाणयस्स चत्तारि सुत्तगाहाओ अणुभासियवाओ । तदो उवसामणा समत्ता भवदि । करणके प्रथम समयमे स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है (९२) । गिरनेवालेके अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है ( ९३ ) ॥६९१-६९९॥ चूर्णिसू०-गिरनेवालेके अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है ( ९४ ) । गिरनेवालेके अपूर्वकरणके प्रथम समयमे स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है। (९५) । गिरनेवालेके अनिवृत्तिकरणके अन्तिम समयमें स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है ( ९६)। उपशामकके अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमे स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है ( ९७ ) । उपशासकके अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है ( ९८ ) । उपशामकके अपूर्व- - करणके प्रथम समयमे स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है ( ९९ ) ॥७००-७०५॥ चूर्णिसू०-इस प्रकार उपशामक-सम्बन्धी अल्पबहुत्वके पश्चात् उपशान्तमोहसे गिरनेवाले जीवके 'पडिवादो कदिविधो' इत्यादि चार सूत्रगाथाओकी विभाषा करना चाहिए। उनकी विभाषा करनेपर उपशामना समाप्त होती है ॥७०६॥ इस प्रकार चारित्रमोह-उपशामना नामक चौदहवाँ अर्थाधिकार समाप्त हुआ। २३
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy