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गा० १२३] पतमान-उपशामक-विशेषक्रिया-निरूपण ६९८. अपुरकरणस्स पढमसमए द्विदिवंधो संखेज्जगुणो। ६९९. पडिवदमाणयस्स अपुव्वकरणस्स चरिमसमए हिदिबंधो संखेज्जगुणो।।
७००. पडिवदमाणयस्स अपुचकरणस्स चरिमसमए ठिदिसंतकम्मं संखेज्जगुणं । ७०१. पडिवदमाणयस्स अपुचकरणस्स पडमसमये ठिदिसंतकम्मं विसेसाहियं । ७०२. पडिवदमाणयस्स अणियट्टिस्स चरिमसमये ठिदिसंतकम्मं विसेसाहियं । ७०३. उवसामगस्स अणियट्टिस्स परमसमये ठिदिसंतकम्मं संखेज्जगुणं । ७०४. उवसामगस्स अपुव्वकरणस्स चरिमसमए ठिदिसंतकम्मं विसेसाहियं । ७०५ उवसामगस्स अपुन्छकरणस्स परमसमए ठिदिसंतकर्म संखेज्जगुणं।
७०६. एत्तो पडिवदमाणयस्स चत्तारि सुत्तगाहाओ अणुभासियवाओ । तदो उवसामणा समत्ता भवदि । करणके प्रथम समयमे स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है (९२) । गिरनेवालेके अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है ( ९३ ) ॥६९१-६९९॥
चूर्णिसू०-गिरनेवालेके अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है ( ९४ ) । गिरनेवालेके अपूर्वकरणके प्रथम समयमे स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है। (९५) । गिरनेवालेके अनिवृत्तिकरणके अन्तिम समयमें स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है ( ९६)। उपशामकके अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमे स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है ( ९७ ) । उपशासकके अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है ( ९८ ) । उपशामकके अपूर्व- - करणके प्रथम समयमे स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है ( ९९ ) ॥७००-७०५॥
चूर्णिसू०-इस प्रकार उपशामक-सम्बन्धी अल्पबहुत्वके पश्चात् उपशान्तमोहसे गिरनेवाले जीवके 'पडिवादो कदिविधो' इत्यादि चार सूत्रगाथाओकी विभाषा करना चाहिए। उनकी विभाषा करनेपर उपशामना समाप्त होती है ॥७०६॥
इस प्रकार चारित्रमोह-उपशामना नामक चौदहवाँ अर्थाधिकार समाप्त हुआ।
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