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________________ गा० १२३ ] पतमान- उपशामक - विशेष क्रिया- निरूपण गच्छेज्ज । ५४४. आसाणं पुण गदो जदि मरदि, ण सक्को णिरयगदिं तिरिकखगर्दि मणुसगदिं वा गंतु । णियमा देवगदिं गच्छदि । ५४५. हंदि तिसु आउएस एक्केण वि बज्रेण आउगेण ण सक्को कसा उवसामेढुं । ५४६. एदेण कारणेण निरयगादि - तिरिक्खजोणि- मणुस्सगदीओ ण गच्छदि । ७२७ ५४७. एसा सव्वा परूवणा पुरिसवेदस्स कोहेण उवदिस्स । ५४८. पुरिसवेदस्स चेव माणेण उवट्ठिदस्स णाणत्तं । ५८९. तं जहा । ५५०. जाव सत्तणोकसाया मुवसामणा ताव णत्थि णाणत्तं । ५५१. उवरि माणं वेदंतो कोहमुवसामेदि । ५५२. जही कोण उवदिस्त कोहस्स उवसामणद्धा तद्देही चेव माणेण वि उवदिस्त कोहस्स उवसामणद्धा । ५५३. कोधस्स पढमट्ठिदी णत्थि । ५५४. जद्देही कोहेण उवदिस्स कोधस्स च माणस्स च पडमट्ठिदी, तद्देही माणेण उवदिस्स माणस्स पढमट्ठिदी । ५५५. माणे वसंते पत्तो सेसस्स उवसामेयव्वस्स मायाए लोभस्स च जो कोहेण उवदिस्स उवसामणविधी सो चैव कायव्वो । ५५६ माणेण उवट्ठिदो उवसामेयूण तदो पडिव - मरता है, तो नरकगति, तिर्यंचगति अथवा मनुष्यगतिको नहीं जा सकता, किन्तु नियम से देवगतिको जाता है । क्योकि, ऐसा नियम है कि नरकायु, तिर्यगायु और मनुष्यायु इन तीनो आयुकर्मोंमे से एक भी आयुको बॉधनेवाला जीव कषायोका उपशम करने के लिए समर्थ नहीं हो सकता । इस कारण से उपशमश्रेणी से उतरकर सासादन गुणस्थानको प्राप्त जीव नरकगति, तिर्यग्योनि और मनुष्यगतिको नही जाता है ॥५४२- ५४६॥ चूर्णिसू० ० - यह सब प्ररूपणा क्रोधकषायके उदयके साथ उपशमश्रेणीपर चढ़नेवाले पुरुषवेदी जीवकी है। मानकपायके उदयके साथ श्रेणीपर चढ़नेवाले पुरुषवेदी जीवके कुछ विभिन्नता होती है, जो इस प्रकार है- जब तक सात नोकषायोकी उपशमना होती है, तब तक तो कोई विभिन्नता नहीं है । ऊपर विभिन्नता है जो इस प्रकार है - मानकषायका वेदन करनेवाला जीव पहले क्रोधकषायको उपशमाता है । क्रोधकषायके उदयसे श्र ेणी चढ़ने मानकपायके उदयसे श्रेणी चढ़ने वाले जीवके जितना क्रोधका उपशमनकाल है, उतना ही वाले जीवके क्रोधका उपशमनकाल है । इसके क्रोध की प्रथमस्थिति नही होती है । क्रोधकपाय के साथ चढ़नेवाले जीवके जितनी क्रोध और मानकी प्रथमस्थिति है, उतनी ही मानकषाय के साथ चढ़नेवाले जीवके मानकी प्रथमस्थिति होती है। मानकषायके उपशम हो जानेपर इससे अवशिष्ट बचे हुए उपशमनके योग्य माया और लोभकी जो उपमन क्रोधकषायके साथ चढ़नेवाले जीवकी है, वही यहाॅ भी प्ररूपणा करना चाहिए। मानकपायके साथ श्रेणी चढ़नेवाले जीवके कषायोंका उपशमन करके और वहाँ से गिरकर लोभकपायका -ः ताम्रपत्रवाली प्रतिमे 'कायव्वो' पदसे आगे 'माणेण उवदिस्स माणे उवसंते जादे' इतना टोकाश भी सूत्ररूपसे मुद्रित है । ( देखो पृ० १९१८ )
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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