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________________ कलाय पाहुड सुप्त [ १४ चारित्रमोह-उपशामनाधिकार मोहणीयस्स विदिबंधो विसेसाहिओ । ४३०. एदेण कमेण संखेज्जेसु हिदिबंध सहस्से सु गदे चरिमसमयमायावेदगो जादो । ४३१. ताथे दोन्हं संजलणाणं द्विदिवंधो चत्तारि मासा अंतत्तणा । ४३२ सेसाणं कम्माणं ठिदिबंधो संखेज्जाणि वस्ससहस्त्राणि । ४३३. तदो से काले तिविहं माणमोकड्डियूण माणसंजलणस्स उदद्यादिगुणसेटिं करेदि । ४३४. दुविहस्स माणस्स आवलियबाहिरे गुणसेडिं करेदि । ४३५ णवचिहस्स वि कसायरस गुणसे डिणिक्खेवो । ४३६. जा तस्स पडिवदमाणगस्स माणवेदगद्धा, ततो विसेसाहिओ णिक्खेवो । ४३७. मोहणीयवज्जाणं कम्माणं जो पढमसमयसुहुमसांपराइएण णिकखेो णिक्खित्तो तस्स णिक्खेवस्स सेसे सेसे णिक्खिवदि । ४३८. पदमसमयमाणवेदगस्स नवविहो वि कसायो संकमदि । ४३९. ताचे तिन्हं संजलणाणं द्विदिवंधो चत्तारि मासा पडिवण्णा । ४४०. सेसाणं कम्माणं द्विदिबंधो संखेज्जाणि वस्ससहस्त्राणि । ४४१. एवं डिदिबंध सहस्त्राणि बहूणि गंतूण माणस्स चरिमसमयवेदगस्स दिहं संजलणाणं द्विदिबंधो अटु मासा अंतोमुहुत्तूणा । ४४२. सेसाणं कम्माणं द्विदिबंधो संखेज्जाणि वस्ससहस्त्राणि । ४४३. से काले तिविहं कोहमोकड्डियूण कोहसंजणस्स उदयादि-गुणसेडिं करेदि । दुविहस्स कोहस्स आवलियबाहिरे करेदि* । शेप कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातगुणा होता है । मोहनीयका स्थितिबन्ध विशेष अधिक होता है । इस क्रम संख्यात सहस्र स्थितिबन्धोके बीतने पर वह चरमसमयवर्ती मायावेदक होता है । उस समय दो संज्वलनोका स्थितिवन्ध अन्तर्मुहूर्तं कम चार मास होता है और शेप कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्ष होता है ॥४३१-४३२॥ चूर्णिम् ० - तत्पश्चात् अनन्तर समयमे तीन प्रकारके मानका अपकर्षण करके संज्वलनमानकी उदयादि गुणश्रेणी करता है। दो प्रकार के मानकी उदयावली के बाहिर गुण - श्रेणी करता है । अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलनसम्बन्धी लोभ, माया और मानरूप नौ प्रकारकी कपायका गुणश्रेणीनिक्षेप होता है | श्रेणीसे नीचे गिरनेवाले उस जीवका जो मानवेदककाल है, उससे विशेष अधिक निक्षेप होता है । मोहनीयको छोड़कर शेप कर्मोंका जो निक्षेप प्रथमसमयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकके द्वारा निक्षिप्त किया गया है, उसके शेप शेप निक्षेपण करता है । प्रथमसमयवर्ती मानवेदकके नवो प्रकारका कपाय संक्रमणको प्राप्त होता है । उस समय तीन संज्वलनोका स्थितिबन्ध पूरे चार मास होता है । शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्षप्रमाण होता है । इस प्रकार बहुतसे स्थितिवन्ध - सहस्र व्यतीत होते हैं, तब अन्तिम समय में मानका वेदन करनेवाले जीवके तीन संज्वलनोका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त कम आठ मास होता है और शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्ष प्रमाण होता है । तदनन्तरकालमे तीन प्रकारके क्रोधका अपकर्षण करके संचलनकोधकी उदयादि-गुणश्रेणी करता है । अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण, इन दोनो प्रकारके क्रोधी उदयावलीके बाहिर गुणश्रेणी करता है ॥ ४३३-४४३॥ ७१८ * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'दुविहस्ल कोहस्स आवलियवाहिरे करेद्रि' इतने सूत्राको टीकामें सम्मिलित कर दिया है । ( देखो पृ० १९०१ )
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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