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________________ गा० १२३] पतमान-उपशामक-विशेषक्रिया-निरूपण ७१९ ४४४. एण्हि गुणसेहिणिक्खेवो केत्तियो कायव्यो ? ४४५. पडमसमयकोधवेदगस्स बारसण्हं पि कसायाणं गुणसेदिणिक्खेवोक सेसाणं कम्माणं गुणसेदिणिक्खेवेण सरिसो होदि । ४४६ जहा मोहणीयवज्जाणं कम्माणं सेसे सेसे गुणसेटिं णिक्खियदि तम्हा एत्तो पाए वारसण्हं कसायाणं सेसे सेसे गुणसेही णिक्विविदव्या । ४४७. पहमसमयकोहवेदगस्स बारसविहस्स वि कसायस्स संकमो होदि । ४४८. ताधे द्विदिवंधो चउण्हं संजलणाणमट्ठ मासा पडिवुण्णा । ४४९. सेसाणं कम्माणं द्विदिवंधो संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि । ४५०. एदेण कमेण संखेज्जेसु द्विदिबंधसहस्सेसु गदेसु मोहणीयस्स चरिमसमयचउविहबंधगो जादो । ४५१ ताधे मोहणीयस्स हिदिबंधो चदुसहिवस्साणि अंतोमुहुत्तूणाणि । ४५२. सेसाणं कम्माणं द्विदिवंधो संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि । ४५३. तदो से काले पुरिसवेदस्स बंधगो जादो । ४५४. ताधे चेव सत्तण्हं कम्माणं पदेसग्गं पसत्थ-उवसामणाए सव्चमणुवसंतं । ४५५. ताधे चेव सत्तकम्मसे ओकड्डियूण पुरिसवेदस्स उदयादिगुणसेहिं करेदि । ४५६ छण्हं कम्यंसाणमुदयावलियबाहिरे गुणसेहिं करेदि । ४५७. गुणसेडिणिक्खेवो वारसण्हं कसायाणं सत्तण्हं शंका-इस समय, अर्थात् क्रोधवेदकके प्रथम समयमें कितना गुण श्रणी-निक्षेप करने योग्य है ? ॥४४४॥ समाधान-प्रथमसमयवर्ती क्रोधवेदकके बारहो ही कषायोका गुणश्रोणीनिक्षेप शेष कर्मोंके गुणश्रेणीनिक्षेपके सदृश होता है ।।४४५॥ चूर्णिसू०-जिस प्रकार मोहनीयकर्मको छोड़कर शेष कर्मोंकी गुणश्रेणीको शेप शेषमे निक्षेपण करता है उसी प्रकार यहाँसे लेकर बारह कषायोकी गुणश्रणी शेष शेपमे निक्षेपण करना चाहिए। प्रथमसमयवर्ती क्रोधवेदकके बारह प्रकारके कषायका संक्रमण होता है। उस समय चारो संज्वलनोंका स्थितिबन्ध पूरे आठ मास है। शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्प है। इस क्रमसे संख्यात सहस्र स्थितिबन्धोंके बीत जानेपर मोहनीयके चतुर्विध बन्धका अन्तिम समयवर्ती बन्धक होता है। उस समय मोहनीयका स्थितिवन्ध अन्तर्मुहूर्त कम चौसठ वर्ष है । शेष कर्मोंका स्थितिवन्ध संख्यात सहस्र वर्ष है ॥४४६-४५२॥ चूर्णिसू०- तदनन्तर कालमें वह पुरुपवेदका वन्धक हो जाता है। उसी समयमे ही सात कोंका सर्व प्रदेशाग्र प्रशस्तोपशामनासे अनुपशान्त हो जाता है। उस समय हास्यादि सात कांशोका अपकर्पण करके पुरुषवेदकी उद्यादि-गुणश्रेणीको करता है और शेष छह कर्माशोंकी उदयावलीके बाहिर गुणश्रेणी करता है। बारह कपाय और सात नोकपायवेदनीयोका गुणश्रेणीनिक्षेप आयुकर्मको छोड़कर शेप कर्मोंके गुणश्रोणी-निक्षेपके तुल्य ताम्रपत्रवाली प्रतिमे इस पदके प्रारम्भमे 'जो' और अन्तमें 'सो' पद और भी मुद्रित है। (देखो पृ० १९०१) ताम्रपत्रवाली प्रतिमे 'उदयादिगुणसेढिं' के स्थानपर 'उदयादिगुणसेढिसीसयं' पाठ मुद्रित है । (देखो पृ० १९०३)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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