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________________ गा० १२३ ] पतमान- उपशासक - विशेष क्रिया- निरुपण ७१७ विसेसाहिओ । ४१७. लोभवेदगद्वाए विदियस्स तिभागस्स संखेज्जदिभागं गंतूण मोहणीयस्स द्विदिबंधो मुहुत्तपुधत्तं । ४१८. णामा-गोद-वेदणीयाणं द्विदिबंधो संखेज्जाणि वस्ससहस्त्राणि । ४१९. तिन्हं वादिकम्माणं द्विदिबंधो अहोरतपुधत्तिगादो ङिदिववादो वस्ससहस्तपुत्तिगो द्विदिबंधो जादो । ४२० एवं द्विदिबंध सहस्सेसु गदेसु लोभवेदगद्धा पुण्णा | ४२१. से काले मायं तिविमोकड्डियूण मायासंजलणस्स उदयादि-गुणसेडी कदा | दुविहार माया आवलियबाहिरा गुणसेढी कदा । ४२२. पढमसमयमायावेदगस्स गुणसे डिणिक्खेव तिविहस्स लोहस्स तिविहाए मायाए च तुल्लो। मायावेदगद्वादो विसेसाहिओ । ४२३. सव्वमायावेदगद्धाए तत्तिओ तत्तिओ चेव णिक्खेवो । ४२४. सेसाणं कम्माणं जो वुण पुव्विल्लो णिक्खेवो तस्स सेसे सेले चेव णिक्खिवदि गुणसेटिं ४२५. मायावेदगस्स लोभो तिविहो, माया दुविहा, मायासंजलणे संकमदि । माया तिविहा लोभो च विहो । लोभसंजलणे संकमदि । ४२६. पढमसमयमायावेदगस्स दोन्ह संजलणाणं दुमासट्ठिदिगो बंधो । ४२७. सेसाणं कम्माणं ठिदिबंधो संखेज्जवस्ससहस्साणि । ४२८. पुणे पुणे ठिदिबंधे मोहणीयवज्जाणं कम्माणं संखेज्जगुणो विदिबंधो । ४२९. संख्यातवें भाग आगे जाकर मोहनीय कर्मका स्थितिबन्ध मुहूर्त पृथक्त्व होता है । नाम, गोत्र और वेदनीय कर्मका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्ष होता है । तीन घातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध अहोरात्र - पृथक्त्वरूप स्थितिबन्धसे वर्षसहस्र पृथक्त्व-प्रमाण स्थितिबन्ध हो जाता है । इस प्रकार सहस्रो स्थितिबन्धो के व्यतीत होनेपर लोभका वेदककाल पूर्ण हो जाता है ।।४११-४२२।। चूर्णिसू० - तदनन्तर कालमें तीन प्रकारकी मायाका अपकर्षण करके संज्वलन मायाकी तो उदयादि गुणश्रेणी करता है तथा शेप दो प्रकारके मायाकी उदयावली के बाहिर गुण - श्रेणी करता है । प्रथम समयवर्ती मायावेदकके तीन प्रकारके लोभका और तीन प्रकारकी मायाका गुणश्रेणीनिक्षेप तुल्य है, तथा मायावेदक - कालसे विशेप अधिक है । सम्पूर्ण मायावेदककालमें उतना उतना ही निक्षेप होता है । पुनः शेष कर्मोंका जो पूर्वका निक्षेप है, उसके शेष शेषमें ही गुणश्र ेणीका निक्षेप करता है। मायावेदकके तीन प्रकारका लोभ और दो प्रकारकी माया संज्वलनमायामें संक्रमण करती है। तथा तीन प्रकारकी माया और दो प्रकारका लोभ संज्वलनलोभमे संक्रमण करता है । प्रथम समयवर्ती मायावेदकके दोनो संज्वलन कपायोंका दो मास की स्थितिवाला बन्ध होता है । शेप कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात सहस्र वर्ष प्रमाण होता है । प्रत्येक स्थितिबन्धके पूर्ण होनेपर मोहनीयको छोड़कर * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'गुणसेटिं' इतना अग टीकाके प्रारम्भमें [ गुणसेढ ] इस प्रकार से मुद्रित है । (देखो पृ० १८९९ ) | ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'च दुविहो' इस पाठके स्थानपर 'चउव्विहो' पाठ मुद्रित है । ( देखो पृ० १८९९ )
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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