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________________ ७१६ कसाय पाहुड सुत्त [ १४ चारित्रमोह-उपशामनाधिकार ३९९. लोभं वेदयमाणस्स इमाणि आवासयाणि । ४००. तं जहा। ४०१. लोभवेदगद्धाए पढमतिभागो किट्टीणमसंस्खेज्जा भागा उदिण्णा । ४०२. परमसमए उदिण्णाओ सिट्टीओ थोवाओ। ४०३. विदियसमए उदिण्णाओ किट्टीओ विसेसाहियाओ । ४०४. सबसुहुमसांपराइयद्धाए विसेसाहियवड्डीए किट्टीणसुदयो । ४०५. किट्टीवेदगद्धाए गदाए पडमसमयवादरसांपराइयो जादो । ४०६. ताहे चेव सत्रमोहणीयस्स अणाणुपुचिओ संकयो । ४०७. ताहे चेत्र दुविहो लोहो लोहसंजलणे संछुहदि । ४०८. ताहे चेव फद्दयगदं लोभं वेदेदि । ४०९. किट्टीओ सव्वाओ गट्ठाओ। ४१०. णवरि जाओ उदयावलियम्भंतराओ ताओ त्थिवुक्कसंकमेण फद्दएसु चिपचिहिति । ४११. पदमसमयबादरसांपराइयस्स लोभसंजलणस्स हिदिबंधो अंतोमुहुत्तो । ४१६. तिण्हं धादिकम्माणं द्विदिबंधो दो अहोरत्ताणि देसणाणि । ४१३. वेदणीय-णामागोदाणं हिदिवंधो चत्तारि वस्साणि देसणाणि । ४१४. एदम्हि पुण्णे द्विदिबंधे जो अण्णो वेदणीय-णामा-गोदाणं हिदिबंधो सो संखेज्जवस्ससहस्साणि । ४९५. तिण्हं धादिकम्माणं द्विदिवंधो अहोरत्तपुधत्तिगो। ४१६. लोभसंजलणस्स हिदिवंधो पुव्यबंधादो चूर्णिसू०-लोभको वेदन करनेवाले जीवके ये वक्ष्यमाण आवश्यक होते हैं। वे इस प्रकार हैं-लोभ-वेदककालका अर्थात् सूक्ष्म-बादरलोभके वेदन करनेके कालका जो प्रथम त्रिभाग है अर्थात् सूक्ष्मलोभके वेदनका काल है, उसमें कृष्टियोका असंख्यात बहुभाग उदयको प्राप्त होता है। प्रथम समयमै उदय-प्राप्त कृष्टियाँ स्तोक हैं। द्वितीय समयमे उदयप्राप्त कृष्टियाँ विशेष अधिक हैं । इस प्रकार सर्व सूक्ष्मसाम्परायिक-कालमे प्रतिसमय विशेपाधिक वृद्धिसे कृष्टियोका उदय होता है ।।३९९-४०४॥ चर्णिस०-कृष्टियोके वेदककालके व्यतीत होनेपर वह प्रथमसमयवर्ती बादरसाम्परायिक हो जाता है। उस ही समयमें मोहनीयकर्मका अनानुपूर्वी अर्थात् आनुपूर्वी-रहित संक्रमण प्रारम्भ हो जाता है। उसी समयमे दो प्रकारका लोभ संचलनलोभमे संक्रमण करता है । उस ही समयमे स्पर्धकगत लोभका वेदन करता है। उस समय सब कृष्टियाँ नष्ट हो जाती है। विशेष वात इतनी है कि जो कृष्टियाँ उदयावलीके भीतर हैं, वे स्तिवुकसंक्रमणके द्वारा स्पर्धकोंमें विपाकको प्राप्त होती हैं ।।४०५-४१०।। चूर्णिसू०-प्रथमसमयवर्ती वादरसाम्परायिकसंयतके संचलनलोभका स्थितिवन्ध अन्तमुहूर्तमात्र है। तीन घातिया कर्मोंका स्थितिवन्ध देशोन दो अहोरात्र है । वेदनीय, नाम और गोत्र इन कर्मोंका स्थितिवन्ध देशोन चार वर्ष है। इस स्थितिवन्धके पूर्ण होनेपर जो वेदनीय, नाम, और गोत्रकर्मोंका अन्य स्थितिवन्ध होता है, वह संख्यात सहस्र वर्ष है । तीन घातिया कर्मोंका स्थितिवन्ध अहोरात्र पृथक्त्वप्रमाण होता है । संज्वलन लोभका स्थितिबन्ध पूर्व बन्धसे विशेष अधिक होता है। लोभ-वेदककालके द्वितीय विभागके * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'सधसुहमसांपराइयद्धाए विसेसाहियवडढीए किट्टीणमुटयो' इस सूत्रको टीकामें सम्मिलित कर दिया है । ( देखो पृ० १८९५)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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