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________________ ७९३ गा० १२३ । चारित्र मोह - उपशामक विशेष क्रिया निरूपण साणि सत्त करणाणि णत्थि । ३६२. वेदणीयस्स बंधणाकरणमोवट्टणाकरणमुच्वट्टणाकरणं संक्रमणाकरणं एदाणि चत्तारि करणाणि अत्थि, सेसाणि चत्तारि करणाणि णत्थि । ३६३. मूलपयडीओ पडुच्च एस कमो ताव जाव चरिमसमयबादरसांपराइयो ति । ३६४. सुहुमसां पराइयस्स मोहणीयस्स दो करणाणि ओवट्टणाकरणमुदीरणा करणं च । सेसाणं कम्माणं ताणि चैव करणाणि । ३६५. उवसंतकसायवीयरायस्स मोहणीयस्स वित्किंचि विकरणं, मोत्तृण दंसणमोहणीयं । दंसणमोहणीयस्स विओवट्टणाकरणं संकमणाकरणं च अत्थि । ३६६. सेसाणं कम्माणं पि ओवट्टणाकरणमुदीरणा च अस्थि । वरि आउग - वेदणीयाणमोवट्टणा चेव । ३६७. कं करणं उवसंत अणुवसंतं च कं करणं त्ति एसा सव्वा विगाहा विहासिदा भवदि । ३६८. केच्चिरमुवसामिज्जदि संकमणमुदीरणा च केवचिरं त्ति एदम्हि सुत्ते विहासिज्जमाणे एदाणि चेव अट्ठ करणाणि उत्तरपयडीणं पुध पुध विहासियव्वाणि । ३६९. केवचिरमुवसंतं' ति विहासा । ३७० तं जहा । ३७१. उवसंत णिव्वाघाण अंतोमुहुत्तं । 1 केवल उद्वर्तनाकरण (उत्कर्षणाकरण) होता है, शेष सात करण नही होते हैं । वेदनीयकर्मके बन्धनकरण, अपवर्तनाकरण, उद्वर्तनाकरण और संक्रमणकरण, ये चार करग होते है, शेष चाकरण नहीं होते हैं ।। ३५९-३६२॥ चूर्णिसू० - मूल प्रकृतियो की अपेक्षा यह क्रम बादरसाम्पराय गुणस्थानके अन्तिम समय तक जानना चाहिए । सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान में मोहनीयकर्मके अपवर्तनाकरण और उदीरणाकरण ये दो ही करण होते है । शेष कर्मोंके वे ही उपर्युक्त करण होते है । उपशान्तकषायवीतरागके मोहनीयकर्मका कोई भी करण नहीं होता है, केवल दर्शनमोहनीयको छोड़कर । क्योकि, उपशान्तकषायवीतरागके दर्शनमोहनीयकर्मके अपवर्तनाकरण और संकमणकरण होते है । उपशान्तकषायके शेष कर्मोंके भी अपवर्तनाकरण और उदीरणाकरण होते हैं । केवल आयु और वेदनीय कर्मका अपवर्तनाकरण ही होता है । इस प्रकार चौथी गाथाके पूर्वार्धकी विभापाके द्वारा ही 'कौन करण कहॉ उपशान्त रहता है और कौन करण कहाँ अनुपशान्त रहता है' इस उत्तरार्ध की भी विभाषा हो जाती है और इस प्रकार यह सर्व गाथा ही विभापित हो जाती है ॥ ३६३-३६७॥ चूर्णिसू० - ' चारित्रमोहकी विवक्षित प्रकृति कितने काल तक उपशान्त रहती है, तथा संक्रमण और उदीरणा कितने कालतक होती है' इस तीसरे गाथासूत्रके (पूर्वार्ध की ) विभाषा करनेपर उत्तर-प्रकृतियोंके ये उपर्युक्त आठो ही करण पृथक्-पृथक् रूपसे व्याख्यान करना चाहिए ॥ ३६८ ॥ 0 चूर्णिस्० - 'अब कौन कर्म कितनी देर तक उपशान्त रहता है' तीसरी गाथाके इस तीसरे चरणकी विभापा की जाती है । वह इस प्रकार है - निर्व्याघात अर्थात् मरण आदि व्याघातसे रहित अवस्थाकी अपेक्षा नपुंसकवेदादि मोहप्रकृतियाँ अन्तर्मुहूर्त तक उपशान्त ९०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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