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________________ ६९६ कलाय पाहुड सुक्ष [१५ चारित्रमोह-उपशामनाधिकार १७९. इत्थिवेदे उवसंते [से] काले सत्तण्हं णोकसायाणं उवसामगो । १८०. ताधे चेव अण्णं द्विदिखंडयमण्णामणुभागवंडयंच आगाइदं । अण्णो च द्विदिबंधो पबद्धो । १८१. एवं संखेज्जेसु हिदिवंधसहस्सेसु गदेसु सत्तण्हं णोकसायाणमुवसामणद्धाए संखेज्जदिभागे* गदे तदो णामागोदवेदणीयाणं कम्माणं संखेज्जवस्स हिदिगो बंधो । १८२. ताधे द्विदिवंधस्स अप्पाबहुअं। १८३. तं जहा । १८४. सव्वत्थोवो मोहणीयस्स हिदिबंधो। १८५. णाणावरण-दसणावरण-अंतराइयाणं हिदिवंधो संखेज्जगुणो । १८६. णामा-गोदाणं ठिदिवंधो संखेज्जगुणो । १८७. वेदणीयस्स द्विदिवंधो विसेसाहिओ। १८८. एदम्मि हिदिवंधो पुण्णो जो अण्णो हिदिबंधो सो सन्चकम्माणं पि अप्पप्पणो द्विदिवंधादो संखेजगुणहीणो । १८९. एदेण कमेण द्विदिवंधसहस्सेसु गदेसु सत्त णोकसाया उपसंता । १९०. णवरि पुरिसवेदस्स वे आवलिया बंधा समयूणा अणुवसंता । १९१. तस्समए पुरिसवेदस्स हिदिवंधो सोलस वस्साणि । १९२. संजलणाणं द्विदिवंधो बत्तीस वस्साणि । १९३. सेसाणं कम्माणं द्विदिबंधो संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि । १९४. पुरिसवेदस्स पहमहिदीए जाधे वे आवलियाओ सेसाओ ताधे आगाल-पडिआगालो वोच्छिण्णो । चूर्णिस०-स्त्रीवेदके उपशम हो जानेपर तदनन्तरकालमें शेप सातो नोकषायोका उपशामक होता है, अर्थात् उनका उपशमन प्रारम्भ करता है। उसी समयमे ही अन्य स्थितिकांडक और अन्य अनुभागकांडक घातके लिए ग्रहण करता है, तथा अन्य स्थितिवन्धको वॉधता है। इस प्रकार संख्यात सहस्र स्थितिवन्धोके बीतने पर और सातो नोकपायोके उपशमनकालका संख्यातवॉ भाग बीतने पर नाम, गोत्र और वेदनीय, इन तीनो अघातिया कर्मोंका स्थितिवन्ध संख्यात वर्षोंका होने लगता है । उस समय स्थितिवन्धका अल्पवहुत्व इस प्रकार है-मोहनीयका स्थितिवन्ध सबसे कम है। इससे ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है। इससे नाम और गोत्रका स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है । इससे वेदनीयका स्थितिवन्ध विशेष अधिक होता है ॥१७९-१८७|| चूर्णिसू०-इस स्थितिबन्धके पूर्ण होनेपर जो अन्य स्थितिबन्ध होता है, वह सभी कर्मोंका अपने-अपने पूर्व स्थितिवन्धसे संख्यातगुणा हीन होता है। इस क्रमसे सहस्रो स्थितिवन्धोके व्यतीत होनेपर ( उपशमन की जानेवाली ) सातो नोकषाय भी उपशान्त हो जाती हैं, अर्थात् उनका उपशम सम्पन्न हो जाता है। केवल पुरुषवेदके एक समय कम दो आवलीमात्र समयप्रवद्ध अभी अनुपशान्त रहते है। उस समयमे पुरुषवेदका स्थितिवन्ध सोलह वर्ष है, चारो संज्वलनकषायोका स्थितिवन्ध बत्तीस वर्ष है और शेष कर्मोंका स्थितिवन्ध संख्यात सहस्र वर्प है। पुरुषवेदकी प्रथमस्थितिमे जव दो आवलियाँ शेष रहती हैं, तब आगाल और प्रत्यागाल व्युच्छिन्न हो जाते हैं ॥१८८-१९४॥ * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'संखेजदिभागे' के स्थानपर 'संखेज्जे भागे' ऐसा पाठ मुद्रित है । (देखो पृ० १८४७)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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