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________________ गा० १२३ ] चारित्रमोह-उपशामक- विशेष क्रिया- निरूपण ६९५ चेव अपुवं द्विदिखंडयम पुव्यमणुभागखंडयं द्विदिबंधो च पत्थिदो । १६८. जहा 'सयवेदो उचसामिदो तेणेव कमेण इत्थिवेदं पि गुणसेडीए उवसामेदि । १६९. इत्थवेदस्स उवसामणद्धाए संखेज्जदिभागे। गदे तदो णाणावरणीय दंसणावरणीय-अंतराइयाणं संखेज्जवस्स-ट्ठिदिगो वंधो भवदि । १७०. जाधे संखेज्जवस्स - विदिओ वधो, तस्समए चेव एदासिं तिन्हं मूलपयडीणं केवलणाणावरण - केवलदंसणावरणवज्जाओ सेसाओ जाओ उत्तरपयडीओ तासिमेगट्ठाणिओ बंधो । १७१. जत्तो पाए णाणावरणदंसणावरण- अंतराइयाणं संखेज्जवस्सविदिओ बंधो तम्हि पुण्णे जो अण्णो द्विदिबंधो सो संखेज्जगुणहीणो । १७२. तम्हि समए सव्वकम्माणमप्पाबहुअं भवदि । १७३ तं जहा । १७४. मोहणीयस्स सव्वत्थोवो द्विदिबंधो । १७५. णाणावरण- दंसणावरण-अंतराइयाणं डिदिबंधो संखेज्जगुणो । १७६. गामा-गोदाणं द्विदिबंधो असंखेज्जगुणो । १७७. वेदणीयस्स दिबंध विसेसाहिओ । १७८. एदेण कमेण संखेज्जेसु ट्ठिदिबंध सहस्सेसु गदे इत्थवेदो उवसामिज्जमाणो उवसामिदो । अपूर्व अनुभागकांडक और अपूर्व स्थितिबन्ध प्रारम्भ होता है । जिस क्रमसे नपुंसक वेदका उपशमन किया है, उसी क्रमसे गुणश्रेणीके द्वारा स्त्रीवेद को भी उपशमाता है । त्रीवेदके उपशमनकालके संख्यात भाग बीत जानेपर तत्पश्चात् ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय कर्मका बन्ध संख्यात वर्षकी स्थितिवाला हो जाता है । अर्थात् इस स्थलपर उक्त कर्मोंका स्थितिबन्ध असंख्यात वर्पसे घटकर संख्यात वर्प - प्रमाण रह जाता है । ( किन्तु शेष तीनो अघातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध अब भी असंख्यात वर्षका होता है । ) जिस समय संख्यात वर्षकी स्थितिवाला बन्ध होता है, उसी समय ही इन तीनो घातिया मूल प्रकृतियोकी केवलज्ञानावरण और केवलदर्शनावरण प्रकृतियोको छोड़कर जो शेष उत्तर प्रकृतियाँ है, उनका एक स्थानीय अनुभाग बन्ध होने लगता है । जिस स्थलपर ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मका संख्यात वर्षकी स्थितिवाला बन्ध है, उसके पूर्ण होनेपर जो अन्य बन्ध होता है, वह पूर्वसे संख्यातगुणित हीन होता है । ( किन्तु तीनो अघातिया कर्मोंका अभी भी असंख्यात वर्ष - प्रमाण ही स्थितिबन्ध होता है । ) उस समय सर्व कर्मोंके स्थितिबन्धका जो अल्पबहुत्व है, वह इस प्रकार है - मोहनीयका स्थितिबन्ध सबसे कम है। इससे ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका स्थितिबन्ध' संख्यातगुणा है । इससे नाम और गोत्रकर्मका स्थितिबन्ध असंख्यातगुणा है । इससे वेदनीय कर्मका स्थितिबन्ध विशेष अधिक है । इस क्रमसे संख्यात सहस्र स्थितिबन्धोके बीत जानेपर उपशम किया जानेवाला स्त्रीवेद उपशमित हो जाता है ॥१६६-१७८॥ * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें इससे आगे 'जाधे इत्थिवेदमुवसामेदुमाढत्तो' इतना टोकान भी सूत्ररूपसे मुद्रित है । (देखो पृ० १८४५ ) ·।' ताम्रपत्रवाली प्रतिमें ‘संखेज्जदिभागे' के स्थानपर 'संखेज्जे भागे' पाठ मुद्रित है । (देखो पृ० १८४६ )
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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