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________________ ६९४ फसाय पादृढ सुत्त [१४ चारित्रमोह-उपशार्मनाधिकार सेसाणं कम्माणं ण किंचि उवसामेदि । १५७. जं पहमसमये पदेसग्गमुवसामदि, तं थोवं । जं विदियसमए उवसामेदि तमसंखेज्जगुणं । एवमसंखेज्जगुणाए सेडीए उवसामेदि जाव उवसंतं । १५८. ण,सयवेदस्स पढमसमय उवसामगस्स जस्स वा तस्स वा कम्मस्स पदेसग्गस्स उदीरणा थोवा । १५९. उदयो असंखेज्जगुणो। १६०. णबुंसयवेदस्स पदेसग्गमण्णपयडिसंकामिन्जयाणयमसंखेन्जगुणं । १६१. उवसामिज्जमाणयमसंखेज्जगुणं । १६२. एवं जाव चरिमसमय-उवसंते त्ति ।। १६३. जाधे पाए मोहणीयस्स बंधो संखेज्जवस्स-द्विदिगो जादो, ताथे पाए ठिदिवंधे पुण्णे पुण्णे अण्णो संखेज्जगुणहीणो हिदिबंधो* । १६४. मोहणीयवजाणं कम्माणं णबुंसयवेदमुवसातस्स हिदिबंधे पुण्णे पुण्णे अण्णो द्विदिबंधो असंखेज्जगुणहीणो। १६५. एवं संखेज्जेसु हिदिवंधसहस्सेसु गदेसु णबुंसयवेदो उवसामिज्जमाणो उवसंतो। १६६. णसयवेदे उपसंते से काले इत्थिवेदस्स उवसामगो। १६७. ताधे तक अनिवृत्तिकरणसंयत नपुंसकवेदका आयुक्तकरण उपशामक होता है, अर्थात् यहाँसे आगे नपुंसकवेदका उपशमन प्रारम्भ करता है । शेप कर्मोंका किचिन्मात्र भी उपशमन नहीं करता है । जिस प्रदेशाग्रको प्रथम समयमे उपशान्त करता है, वह अल्प है। जिसे द्वितीय समयमे उपशमित करता है, वह असंख्यातगुणा है। इस प्रकार असंख्यातगुणित श्रेणीसे नपुंसकवेदके उपशान्त होने तक उपशमाता है। प्रथमसमयवर्ती नपुंसकवेद-उपशामकके जिस किसी भी वेद्यमान कर्म-प्रकृति के प्रदेशाप्रकी उदीरणा उपरिम पदोंकी अपेक्षा थोड़ी होती है। उससे जिस किसी भी वेधमान कर्मका उदय असंख्यातगुणा होता है । इससे अन्य प्रकृतिरूप संक्रमण किया जानेवाला नपुंसकवेदका प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है । इससे, उपशममान नपुंसकवेदका प्रदेशाग्र असंख्यातगुणा है। इस प्रकार नपुंसकवेदके उपशान्त होनेके अन्तिम समय तक अल्पवहुत्वका यही क्रम जानना चाहिए ॥१५६-१६२॥ चूर्णिसू०-जिस स्थलपर मोहनीयकर्मका स्थितिवन्ध संख्यात वर्षकी स्थितिवाला होता है, वहाँसे लेकर प्रत्येक स्थितिवन्धके पूर्ण होनेपर अन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा हीन होता है । पुनः नपुंसकवेदका उपशमन करनेवाले जीवके मोहनीयके अतिरिक्त शेष कर्मों के प्रत्येक स्थितिवन्धके पूर्ण होनेपर अन्य स्थितिवन्ध असंख्यातगुणा हीन होता है । इस प्रकार संख्यात सहस्र स्थितिवन्धोके व्यतीत होनेपर प्रतिसमय असंख्यातगुणित श्रेणीके द्वारा उपशमन किया जानेवाला नपुंसकवेद उपशान्त हो जाता है ॥१६३-१६५॥ चर्णिम०-नपुंसकवेदके उपशान्त हो जानेपर तदनन्तरकालमें स्त्रीवेदका उपशामक होता है, अर्थात् स्त्रीवेदका उपशमन प्रारम्भ करता है। उस समयमे ही अपूर्व स्थितिकांडक ____* ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'ट्ठिदिवंधे'के स्थानपर 'ढिदिवंधेण' और 'संखेजगुणहीणो' के स्थानपर 'असंखेजगुणहीणो' पाठ मुद्रित है । (देखो पृ० १८४४)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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