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________________ गा० १२३ ] चारित्र मोह - उपशामक विशेषक्रिया - निरूपण ६८९ १२७. तदो देसघादिकरणादो संखेज्जेसु ठिदिबंधसहस्सेसु गदेसु अंतरकरणं करेदि । १२८. बारसहं कसायाणं णवहं णोकसायवेदणीयाणं च । णत्थि अण्णस्स कम्मस्स अंतरकरणं । १२९. जं संजलणं वेदयदि, जं च वेदं वेदयदि, एदेसिं दोन्ह कम्माणं पढमडिदीओ अंतो मुहुत्तिगाओ ठवेण अंतरकरणं करेदि । १३०. पढमट्ठिदीदो संखेज्जगुणाओ satओ आगाइदाओ अंतरद्वं । १३१. सेसाणमेक्कारसहं कसायाणमट्ठण्हं च णोकसायवेदणीयाणमुदयावलियं मोत्तूण अंतरं करेदि । १३२. उवरि समट्ठिदिअंतरं, हेडा विसमडिदि अंतरं । १३३. जाधे अंतरमुक्कीरदि ताधे अष्णो द्विदिबंधो पवद्धो, अण्णं द्विदिखंडय - मण्णमणुभागखंडयं च गेहदि । १३४. अणुभाग खंडय सहस्सेसु गदेसु अण्णमणुभागखंडयं, तं चैव द्विदिखंडयं, सो चेव द्विदिबंधो, अंतरस्स उक्कीरणद्धा च समगं पुष्णाणि । चूर्णिसू० - पुनः सर्वघाती प्रकृतियोको देशघाती करनेके पश्चात् संख्यात सहस्र स्थितिबन्धोके व्यतीत होने पर अन्तरकरण करता है । यह अन्तरकरण अप्रत्याख्यानादि बारह कषायोका और नवो नोकषायवेदनीयोका होता है । अन्य किसी भी कर्मका अन्तरकरण नहीं होता है । अन्तरकरण करनेके लिए उद्यत उपशामक जिस संज्वलनकषायका वेदन करता है और जिस वेदका वेदन करता है उन दोनो ही कर्मों की अन्तर्मुहूर्त प्रमाण प्रथम स्थितियोको स्थापित करके अन्तरकरण करता है । प्रथम स्थिति से संख्यातगुणी स्थितियाँ अन्तरकरण करनेके लिए गुणश्रेणी शीर्षकके साथ ग्रहण की जाती हैं । शेप अनुदय-प्राप्त ग्यारह कषायोको और आठ नोकषाय- वेदनीयोकी उदयावलीको छोड़कर अन्तर करता है । ऊपर समस्थिति अन्तर है और नीचे विषमस्थिति अन्तर है ।। १२७-१३२॥ विशेषार्थ - उदय या अनुदयको प्राप्त सभी कषाय और नोकपायवेदनीय कर्म - प्रकृतियोकी अन्तरसे ऊपरकी स्थिति तो समान ही होती है, क्योकि द्वितीयस्थिति के प्रथम निषेकका सर्वत्र सदृशरूपसे अवस्थान देखा जाता है, इसलिए 'ऊपर समस्थिति अन्तर है, ' ऐसा कहा गया है । किन्तु अन्तरसे नीचेकी स्थिति विषम होती है, इसका कारण यह है कि अनुदयवती सभी प्रकृतियो के सदृश होनेपर भी उदयको प्राप्त किसी एक संज्वलन कषाय और किसी एक वेदको अन्तर्मुहूर्तमात्र प्रथमस्थिति से परे अन्तर की प्रथमस्थितिका ही अवस्थान देखा जाता है । इसलिए प्रथमस्थितिकी विसदृशता के आश्रय से 'नीचे विषमस्थिति अन्तर है' ऐसा कहा गया है । चूर्णि सू०- ० - जब अन्तर उत्कीर्ण करता है, अर्थात् जिस समय अन्तरकरण आरम्भ करता है, उसी समय में ही अन्य स्थितिबन्ध बाँधता है, तथा अन्य स्थितिकांडक और अन्य अनुभाग कांडकको ग्रहण करता है । इस प्रकार सहस्रो अनुभागकांडकोके व्यतीत होनेपर अन्य अनुभागकांडक, तथा वही स्थितिकांडक, वही स्थितिबन्ध और अन्तरका उत्कीरणकाल, * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'दिट्ठदिबधपबधो' ऐसा पाठ मुद्रित है । ( देखो पृ० १८३५ ) ८७
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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