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________________ ६७४ कसाय पाहुए सुत्त [१३ संयमलब्धि-अर्थाधिकार ५९. तस्सेबुक्स्सयं पडिवज्जमाणयस्स संजमट्ठाणमणंतगुणं । ६०.कम्मभूमियस्स पडिवज्जमाणयस्स उक्कस्सयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ६१. परिहारसुद्धिसंजदस्स जहण्णयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ६२. तस्सेव उक्कस्सयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ६३. सामाइयच्छेदोवट्ठावणियाणमुक्कस्सयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ६४. सुहुमसांपराइयसुद्धिसंजदस्स जहण्णयं संजमट्ठाणमणंतगणं । ६५. तस्सेवुकस्लयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ६६. चीयरायस्स अजहण्णमणुक्कस्सयं चरित्तलद्धिट्ठाणमणंतगुणं । म्लेच्छका मताः। अन्यथाऽन्यैः समाचारैरार्यावर्तेन ते समाः ॥ ( आदिपु० पर्व ३१ श्लो० १४३) इस प्रमाणके आधारसे म्लेच्छोको धर्म-कर्म-परान्मुख माना गया है, तो उनके संयमका ग्रहण कैसे संभव हो सकता है ? इसका समाधान जयधवलाकारने यह किया है कि दिग्विजयके लिए गये हुए चक्रवर्तीके स्कन्धावार ( कटक-सेना ) के साथ जो म्लेच्छराजादिक आर्यखंडमें आजाते हैं और उनका जो यहाँवालोके साथ विवाहादि सम्बन्ध हो जाता है, उनके संयम ग्रहण करनेमे कोई विरोध नहीं है। अथवा दूसरा समाधान यह भी किया गया है कि चक्रवर्ती आदिको विवाही गई म्लेच्छ-कन्याओके गर्भसे उत्पन्न हुई सन्तानकी मातृपक्षकी अपेक्षा यहाँ 'अकर्मभूमिज' पदसे विवक्षा की गई है, क्योंकि इस प्रकारकी अकर्मभूमिज सन्तानको दीक्षा लेनेकी योग्यताका निषेध नहीं पाया जाता है। चूर्णिमू०-संयमको प्राप्त होनेवाले अकर्मभूमिजके जघन्य संयमस्थानसे संयमको प्राप्त होनेवाले उसका ही अर्थात् अकर्मभूमिज मनुष्यका उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणित है । इससे संयमको प्राप्त करनेवाले कर्मभूमिजका उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणित है । इससे परिहारविशुद्धि-संयतका जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणित है। इससे उसका ही उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणित है। इससे सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धि-संयतोका उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणित है । इससे सूक्ष्मसाम्परायशुद्धि-संयतोका जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणित है । इससे सूक्ष्मसाम्परायशुद्धि -संयतोका उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणित है । इससे वीतरागछद्मस्थ और केवलीका अजघन्य-अनुत्कृष्ट चारित्र लब्धिस्थान अनन्तगुणित है ॥५९-६६॥ विशेषार्थ-वहाँ यह शंका की जा सकती है कि वीतरागके जघन्य और उत्कृष्ट चारित्रलब्धि क्यों नहीं बतलाई गई ? इसका समाधान यह है कि कपायोंके अभाव हो जानेसे उनकी चारित्र लब्धिमे जघन्यपना या उत्कृष्टपना संभव नही है। अतएव वीतरागके सर्वदा एक रूपसे अवस्थित ही चारित्रलब्धि पाई जाती है। यदि कहा जाय कि उपशान्तकपायवीतराग. छद्मस्थका पतन अवश्य ही होता है, अतएव पतनकालमें उसके यथाख्यातचारित्रलब्धिका जघन्य अंश क्यो न माना जाय ? और इसी प्रकारसे क्षीणकपाय या केवलीके ऊपर चढ़नेकी अवस्थामें चारित्रलब्धिका उत्कृष्ट अंश क्यों न माना जाय ? तो इसका समाधान यह है कि परिणामोकी तीव्रता-मन्दताका कारण कपायोका उदय है। उपशान्तकषाय, क्षीणकपाय और केवलीके कषायोका सर्वथा अभाव है, अतएव उनके परिणामों में तीव्रता या मन्दताका होना
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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