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________________ अजघन्य-अनुत्कृष्ट-संयमलब्धिस्वरूप निरूपण ली तहा चरित्तस्से त्ति समत्तमणिओगद्दारं । संभव नहीं है । परिणामोकी तीव्रता - मन्दताके विना चारित्रलब्धिका जघन्य या उत्कृष्ट अंश होना संभव नहीं है । इसलिए भले ही एक समय पश्चात् उपशान्तकषायवीतरागसंयत नीचे गिर जाय, परन्तु अपने कालंके अन्तिम समय तक उसके परिणामोंकी विशुद्धिमें कोई कमी नहीं आती । अतः पतनावस्था में उनके यथाख्यातलव्धिका जघन्य अंश नहीं माना जा सकता । यही बात तेरहवें गुणस्थानके अभिमुख क्षीणकषायके या चौदहवें गुणस्थानके अभिमुख सयोगिकेवली के विपयमे है, अर्थात् उनकी लब्धिको भी उत्कृष्ट अंशरूप नहीं माना जा सकता । अतएव यह सिद्ध हुआ कि कपायके अभाव से सभी वीतरागोके यथाख्यातसंयमरूप लब्धि एकरूप होती है, उसमें कोई भेद नहीं होता । यही कारण है कि उनकी लब्धिको हॉपर अजघन्य - अनुत्कृष्ट अर्थात् जघन्यपना और उत्कृष्टपनासे रहित बतलाया गया है । इस प्रकार संयमलब्धि नामक तेरहवाँ अनुयोगद्वार समाप्त हुआ । गा० ११५ ] ६७५
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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