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________________ गा० ११५] संयमलब्धिस्थान-अल्पबहुत्व-निरूपण ই ४६. एदेसिं लद्धिट्ठाणाणमप्याबहुअंक । ४७. तं जहा । ४८. सव्वत्थोवाणि पडिवादट्ठाणाणि । ४९. उप्पादयट्ठाणाणि असंखेज्जगुणाणि । ५०. लट्ठिाणाणि असंखेज्जगुणाणि । ५१. तिव्व-मंददाए सव्वमंदाणुभागं मिच्छत्तं गच्छमाणस्स जहण्णयं संजमट्ठाणं । ५२. तस्सेवुकस्सयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ५३. असंजदसम्मत्तं गच्छमाणस्स जहण्णयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ५४. तस्सेबुक्कस्सयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ५५. संजमासंजमं गच्छमाणस्स जहण्णयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ५६. तस्सेवुक्कस्सयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ५७. कम्मभूमियस्स पडिवज्जमाणयस्स जहण्णयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । ५८. अकम्मभूमियस्स पडिवज्जमाणयस्स जहण्णयं संजमट्ठाणमणंतगुणं । विशेषार्थ-यहॉ सर्व ही पदसे असंख्यात लोकप्रमाण भेदवाले सभी प्रतिपातस्थान, प्रतिपद्यमानस्थान और अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमानस्थानोका ग्रहण करना चाहिए । अथवा प्रतिपात और प्रतिपद्यमानस्थानोको छोड़कर शेष सर्व अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमान स्थानोंको लब्धिस्थान जानना चाहिए। चूर्णिसू०-अब इन लब्धिस्थानोका अल्पबहुत्व कहते है। वह इस प्रकार है-संयमलब्धिके प्रतिपातस्थान सबसे कम है। प्रतिपातस्थानोसे उत्पादकस्थान असंख्यातगुणित है और उत्पादकस्थानोंसे लब्धिस्थान असंख्यातगुणित है ॥४६-५०॥ - चूर्णिसू०-अब लब्धिस्थानोका तीव्र-मन्दता-विषयक अल्पबहुत्व कहते हैं-मिथ्यात्वको जानेवाले चरम समयवर्ती संयतके जघन्य संयमस्थान सबसे मन्द अनुभागवाला होता है। इससे उसके ही, अर्थात् मिथ्यात्वको जानेवाले जीवके उत्कृष्ट लब्धिस्थान अनन्तगुणित है। इससे असंयतसम्यक्त्वको प्राप्त करनेवाले जीवका जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणित है। इससे उसका ही उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणित है । इससे संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले जीवका जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणित है। इससे उसका ही उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणित है। इससे संयमको प्राप्त करनेवाले कर्ममूभिज मनुष्यका जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणित है। इससे संयमको प्राप्त करनेवाले अकर्मभूभिज मनुष्यका जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणित है ॥५१-५८॥ विशेषार्थ-ऊपर जो अकर्मभूभिज मनुष्यके संयमलब्धिस्थान बतलाये गये हैं, सो वहॉपर अकर्मभूभिजका अर्थ भोगभूमिज न करके म्लेच्छखंडज करना चाहिए, क्योकि म्लेच्छोंमें साधारणतः धर्म-कर्मकी प्रवृत्ति न पाई जानेसे उन्हे अकर्मभूमिज कहा गया है। अतएव यहाँ भरत, ऐरावत या विदेहसम्बन्धी कर्मभूमिके मध्यवर्ती सर्व म्लेच्छखंडोका ग्रहण करना चाहिए। यहाँ यह शंका की जा सकती है कि जब 'धर्म-कर्मबहिभूता इत्यमी *ताम्रपत्रवाली प्रतिमे इससे आगे 'एत्थ दुविहमप्पाबहुअं लट्ठिाणसंखाविसयं तिव्वमंददाविसयं च । तत्थ तिव्व-मंददाए अप्पावहुअसुवरि कस्सामो' इतना टीकाका अश मी सूत्ररूपसे मुद्रित है । ( देखो पृ० १८०२-१८०३)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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